Revision summary
यूपी में काशी मंदिरों से ग्राम समूहों तक कई सोसाइटी और न्यास हैं। निष्क्रिय पंजीकरण और कमजोर खाते पहली समस्याएँ हैं। योजना-जुड़े काम में राजनीतिक बोर्ड और भूत लाभार्थी दिखते हैं। स्टाफ लखनऊ–नोएडा–वाराणसी में रहता है; बुंदेलखंड पतला रहता है। जनपद नियमन घोटाले के बाद या तो धीमा या अति-व्यापक है।
Model answer
Introduction
उत्तर प्रदेश में घना स्वैच्छिक क्षेत्र है—काशी और मथुरा के मंदिर न्यास, लखनऊ और पश्चिमी नगरों की सेवा समितियाँ, और बुंदेलखंड के छोटे ग्राम समूह। यहाँ एनजीओ की समस्याएँ पंजीकरण भीड़, कमजोर खाते, राजनीतिकरण और पतली राज्य निगरानी हैं, नागरिक समाज की अनुपस्थिति नहीं।
Body
कानूनी और वित्तीय समस्याएँ
- सोसाइटी, न्यास और धारा-8 कंपनियाँ ओवरलैप करती हैं; यूपी के कई जनपद-स्तरीय एनजीओ सोसाइटी अधिनियम से पंजीकृत होकर फिर निष्क्रिय हो जाते हैं, जिससे बिना मैदान के फाइल भरती है।
- 2020 के बाद एफसीआरए और आयकर जाँच कुछ बड़े प्राप्तकर्ताओं को छूती है, जबकि हिंदी पट्टी के हजारों छोटे समूह अति-नियमन से अधिक बिना अंकेक्षण रह जाते हैं।
- नोएडा–गाजियाबाद उद्योग के सीएसआर और राज्य योजना साझेदारों की ओर अनुदान दौड़ परियोजना एनजीओ बनाती है जो फाइल बंद होते गायब हो जाते हैं।
शासन और मैदान समस्याएँ
- नकली लेटरहेड, भूत लाभार्थी, और दोहराए स्व-सहायता सूची तराई और पूर्वांचल जनपदों के पोषण, कौशल और बाढ़ राहत काम में दिखे हैं।
- राजनीतिक बोर्ड और जाति-कब्जा स्थानीय समितियाँ पंचायत गुट और ‘स्वैच्छिक’ निकाय की रेखा धुंधला करती हैं।
- पेशेवर स्टाफ लखनऊ, नोएडा और वाराणसी में जुटता है; बुंदेलखंड और पूर्वी ब्लॉक को आवासीय क्षमता नहीं, भ्रमण दल मिलते हैं।
- आशा, आंगनवाड़ी और पंचायत से समन्वय कमजोर है, इसलिए एनजीओ विशेषज्ञ अंतर जैसे विकलांगता या विधिक सहायता भरने की जगह सरकारी शिविर दोहराते हैं।
राज्य पक्ष की समस्याएँ
- जनपद एनजीओ प्रकोष्ठ और रजिस्ट्रार कार्यालयों में फॉरेंसिक खाता कौशल नहीं; रद्दीकरण धीमा है, इसलिए ईमानदार समूह और खोल एक ही निर्देशिका में बैठते हैं।
- घोटाले के बाद अति-संदेह असली आपदा और शिक्षा काम जमा सकता है; कम निगरानी तीर्थ नगर में बिना सार्वजनिक खाते संग्रह चलने देती है।
Flow diagram
flowchart TD Reg[बहु पंजीकरण] --> P[एनजीओ समस्या यूपी] Acc[कमजोर अंकेक्षण एफसीआरए] --> P Pol[राजनीतिक बोर्ड] --> P Geo[लखनऊ बनाम बुंदेलखंड] --> P Dist[पतली जनपद निगरानी] --> P
Conclusion
उत्तर प्रदेश में एनजीओ समस्याएँ भीड़भाड़ पंजीकरण, कमजोर अंकेक्षण, राजनीतिकरण, शहरी स्टाफ झुकाव, और या तो सोई या कंबल-संदेह वाली जनपद निगरानी हैं। विश्लेषण भीड़ भरे स्वैच्छिक बाजार का है, बिना एनजीओ वाले राज्य का नहीं।
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Next question in the 2024 paper (Q9). View answer →
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क्या यूपी के सभी एनजीओ धोखा हैं?
नहीं। समस्या एक ही सूची में असली सेवा समूह और निष्क्रिय या कब्जा खोल का मिश्रण है।
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भूगोल समस्या क्यों है?
क्षमता कुछ नगरों में बैठती है। बुंदेलखंड और तराई के सूखा-बाढ़ ब्लॉक को कम आवासीय एनजीओ कौशल मिलता है।
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