Revision summary
असहयोग अन्यायपूर्ण साम्राज्य से इच्छा की नैतिक वापसी था, केवल बहिष्कार चाल नहीं। अहिंसा और सत्य ने साधन बाँधे; विपक्षी व्यक्ति रहा। स्वराज भय और लोभ पर शासन से शुरू हुआ, खादी, जेल और एकता-कार्य से सिखाया। चौरी चौरा दार्शनिक ब्रेक था जब हिंसा घुसी। गणतंत्र के अधिकारी के लिए यह विधिवत सरकार तोड़ना नहीं; पत्रावली अपमान को न देना है।
Model answer
Introduction
असहयोग राज के विरुद्ध तुनकमिजाज नहीं था। दार्शनिक रूप में वह पहले आत्मा का स्वराज था: अन्यायपूर्ण व्यवस्था को अपनी इच्छा न देना, और उस इंकार को अहिंसा, सत्य और रचनात्मक विकल्प से बाँधे रखना।
Body
दार्शनिक केंद्र
- गांधी राज्य को शासित के सहयोग का जरूरतमंद मानते थे; अपमानजनक व्यवस्था से वह सहयोग वापस लेना नैतिक कर्म था, केवल चाल नहीं — थोरो के सविनय अवज्ञा और टॉलस्टॉय के प्रेम-नियम का ऋण।
- अहिंसा दार्शनिक सीमा थी: विपक्षी व्यक्ति रहा, इसलिए आंदोलन भीड़ के चेहरे वाली हत्या नहीं बन सकता था।
- सत्य ने साधन को साध्य से मिलाने को कहा; झूठ, दंगा या जला अभिलेखागार इस दावे को रद्द कर देता कि स्वराज आत्मा का आत्म-शासन है।
- हिंद स्वराज में स्वराज झंडे से पहले अपने लोभ और भय पर शासन है; असहयोग ने बहिष्कार, चरखा और बिना द्वेष जेल जाकर वह आंतरिक शासन सिखाया।
- कांट का व्यक्ति-सम्मान और गीता का निष्काम कर्म दोनों यहाँ बैठते हैं: फल की लालसा बिना उपयुक्त कर्तव्य करो, और अंग्रेज को केवल वस्तु न बनाओ।
आंदोलन ने क्या जिया
- उपाधि, कौंसिल, विद्यालय और विदेशी वस्त्र का बहिष्कार लोक शिक्षा थी: गरिमा कब्जेदार का प्रमाणपत्र नहीं।
- रचनात्मक कार्यक्रम — खादी, हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता का अंत — असहयोग का सकारात्मक आधा था; बिना नई आदत का दर्शन केवल नहीं होता।
- चौरी चौरा ने दार्शनिक लागत दिखाई: हिंसा घुसी तो गांधी ने आंदोलन स्थगित किया क्योंकि साधन विचार से गिर गए थे।
- जन सत्याग्रह में झुंड-राग का जोखिम भी था; गांधी के उपवास और आत्म-शुद्धि की माँग दर्शन को भीड़ में डूबने से बचाने के प्रयास थे।
लोक सेवक को ध्यान देने योग्य सीमाएँ
- असहयोग अधिकारी को विधिवत लोकतांत्रिक सरकार तोड़ने का लाइसेंस नहीं; गांधी का लक्ष्य अप्रतिनिधिक साम्राज्य था, और तब भी उन्होंने सार्वजनिक, अहिंसक, जवाबदेह विरोध पर जोर दिया।
- प्रशासन के लिए जीवित अवशेष यह नीति है कि पत्रावली अपमान को न दी जाए, और जब भीड़ विश्वास वापस ले तो रचनात्मक विकल्प दिया जाए — सकारण आदेश, चलता राशन, शांति बैठक।
Flow diagram
flowchart TD U[अन्यायपूर्ण व्यवस्था] --> W[सहयोग वापस] A[अहिंसा और सत्य] --> W C[रचनात्मक कार्यक्रम] --> S[आत्मा का स्वराज] W --> S
Conclusion
दार्शनिक रूप में गांधी का असहयोग अन्याय से इच्छा की वापसी था, अहिंसा, सत्य और रचनात्मक स्वराज से बंधा। वह सार्वजनिक रूप में जिया आत्म-शासन था। चौरी चौरा दिखाता है कि साधन उस हिंसा बन जाएँ जिसे वे बदलने का दावा करते थे तो वह गिर जाता है।
Quick related
Students also ask
-
Differentiate between democratic attitude and bureaucratic attitude of public servants.
Next question in the 2019 paper (Q6). View answer →
-
क्या असहयोग अराजकतावाद था?
नहीं। गांधी रूपांतरित व्यवस्था और अनुशासित स्वयंसेवक चाहते थे, सबके विरुद्ध सबका युद्ध नहीं।
-
क्या पीसीएस अधिकारी निर्वाचित सरकार के विरुद्ध असहयोग प्रचार कर सकता है?
तोड़फोड़ के रूप में नहीं। असहमति पत्रावली और विधिवत मार्ग से है। गांधी की विधि सार्वजनिक, अहिंसक और अप्रतिनिधिक राज पर लक्षित थी।
PYQ trend
When UPSC asked this
Related PYQs from other years, newest first. Open a question to read it.
-
2025 · Q4 · UPGS4 · 8 marks
Distinguish between moral responsibility and role (ex-officio) responsibility in the life of a public servant. -
2025 · Q5 · UPGS4 · 8 marks
How would you assess the desirability of Gandhian view regarding ends and means in the context of public fund management? Discuss with suitable examples. -
2022 · Q6 · UPGS4 · 8 marks
“Administration is a moral act and administrator is a moral agent.” Explicate this statement. -
2021 · Q2 · UPGS4 · 8 marks
What are the essential virtues which are responsible for an ideal human ethical behaviour according to Mahatma Gandhi? Discuss. -
2018 · Q4 · UPGS4 · 8 marks
Examine the ethical and social ideas of Gandhi.
More from this paper
Q1 · UPSC Mains 2019 · UPGS4 · 8 marks
नीतिशास्त्र क्या है? मानव-जीवन में इसकी भूमिका की व्याख्या कीजिए।
Ethics and Human Interface
नीतिशास्त्र सही, कर्तव्य और शुभ जीवन पर व्यवस्थित चिंतन है, केवल प्रथा या विधि नहीं। अरस्तू, कांट, धर्म और गांधी आदत, सम्मान, भूमिका और साधन के मानचित्र देते हैं। वह स्वार्थ और भय के खिंचाव में चुनाव चलाता है और कतार तथा अनुबंध संभव बनाता है। लोक जीवन में वह सत्य टिप्पणी और सकारण आदेश बनकर आता है। वह नागरिक पर निजी पंथ थोपना भी वर्जित करता है।
Q2 · UPSC Mains 2019 · UPGS4 · 8 marks
नैतिक मूल्यों के सुदृढ़ीकरण की क्या प्रक्रिया है? क्या नैतिक मूल्यों के सुदृढ़ीकरण से चरित्र-निर्माण में सहायता प्राप्त होती है? विवेचना करें।
Civil Service aptitude and values
मूल्य आदत, विश्वसनीय आदर्श, क्षमा और निष्पक्षता पुरस्कृत करने वाली संस्थाओं से बढ़ते हैं। लोक तर्क माँगता है कि मूल्य कुल से परे बताया जाए। चरित्र वे मूल्य हैं जो बिना निगरानी स्थायी इच्छा बन गए। सुदृढ़ीकरण तभी चरित्र बनाता है जब कर्म लागत से मिले और पद ईमानदारी दंडित न करे। तथ्य ठुकराने वाला ड्रिल सम्मान हठ है, गणतांत्रिक चरित्र नहीं।
Q3 · UPSC Mains 2019 · UPGS4 · 8 marks
संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये। (अ) लोक सेवक की नैतिक जिम्मेदारियाँ। (ब) लोकहित एवं सूचना का अधिकार।
Probity in Governance
नैतिक जिम्मेदारी संविधान, सत्य पत्रावली, तटस्थता और नागरिक-केंद्रित वितरण के प्रति निष्ठा है। अवैध मौखिक आदेश का उत्तर पत्रावली पर है, गुप्त आज्ञापालन पर नहीं। लोकहित खुले समुदाय का कल्याण है, कार्यालय आराम नहीं। आरटीआई 2005 सूचना को नियम बनाता है; धारा 4 और सकारण आदेश उसी नियम की सेवा हैं। छूट निजता और सुरक्षा बचाती हैं; बदला लोकहित नहीं।
Toppers' copies
Toppers' copies for this question will be uploaded soon.