Revision summary
भ्रष्टाचार लोक न्यास बेचता है; चुनौतियाँ राजकोषीय, संस्थागत, राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक हैं। शीर्ष की विशाल चोरी सिखाती है विधि कमजोर के लिये है; छोटी कटौती सिखाती है अधिकार कृपा है। गरीबी दबाव है, पूरी विधि नहीं; संपन्न लालच को अलग जाल चाहिए। रोकथाम एकाधिकार-प्लस-विवेक उलटाती है, दंड निश्चित करती है, ईमानदार बचाती है। समाज को शॉर्टकट खरीदना बंद करना होगा; उस इनकार बिना नारे और पोर्टल हारेंगे।
Model answer
Introduction
भ्रष्टाचार निजी कीमत पर लोक न्यास की बिक्री है। उसकी चुनौतियाँ केवल गायब रुपये नहीं। वे कब्जाया राज्य, निंदक नागरिक, और वह समाज हैं जो अधिकार को कृपा मानने लगता है। रोकथाम पत्रावली, दल, कक्षा और सड़क पर चलनी चाहिए — केवल सतर्कता परिपत्र में नहीं।
Body
भ्रष्टाचार की चुनौतियाँ
- राजकोषीय: पीडीएस, मनरेगा, खरीद और कर में रिसाव; गरीब दो बार देता है — एक कर, फिर कटौती।
- संस्थागत: टेंडर, स्थानांतरण और थाने बाजार बनते हैं; ईमानदार अधिकारी अलग-थलग (महँगे स्थानांतरण की लोक स्मृति)।
- राजनीतिक: अपारदर्शी वित्त और संरक्षण पदस्थापन पत्रावली को दलीय मशीन बनाते हैं।
- सामाजिक: “स्पीड मनी” संस्कृति; त्योहार उपहार मौसम; दलाल समानांतर सिविल सेवा।
- नैतिक: लज्जा मरती है; कौटिल्य की पानी में मछली छवि चेतावनी नहीं, मजाक बन जाती है।
- विषमता: शीर्ष पर विशाल भ्रष्टाचार (स्पेक्ट्रम, कोयला, बैंक धोखाधड़ी) छोटी रिश्वत को बौना करता है और सिखाता है विधि कमजोर के लिये है।
- सेवा वितरण: विलंबित पेंशन, खरीदा लाइसेंस, कीमत पर सांप्रदायिक एफआईआर — अनुच्छेद 21 और 14 सौदेबाजी बन जाते हैं।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण: खनन, रक्षा ऑफसेट और वन स्वीकृतियाँ चुपचाप बिकती हैं।
- मापन: अंधे आँकड़े; रिपोर्ट का भय; वैध विवेक के भीतर छिपा भ्रष्टाचार।
- डिजिटल जुड़वाँ: ई-गवर्नेंस दलाल घटा सकता है या पासवर्ड वाला नया द्वारपाल बना सकता है।
सचिवालय नहीं, समाज क्यों दृश्य है
- कतार लाँघने वाले नागरिकों से शॉर्टकट की माँग आती है।
- प्रतिष्ठा व्यय — विवाह, विदेशी डिग्री — संपन्न में प्रेरक हो सकता है, इसलिए गरीबी एकमात्र विधि नहीं।
- तमाशबीन और व्यावसायिक निकायों का मौन कटौती को सामान्य बनाता है।
समाज में रोकने के कदम
- एकाधिकार प्लस विवेक घटाएँ: प्रकाशित समयसीमा वाले एकल खिड़की, नागरिक घोषणापत्र, बोलते आदेश (क्लिटगार्ड सूत्र उलटा)।
- काटती पारदर्शिता: आरटीआई लगी तख्ती नहीं, प्रयुक्त; सामाजिक अंकेक्षण; खुले अनुबंध; चुनावी-बांड जैसी अपारदर्शिता नागरिक माँग के रूप में अस्वीकृत।
- पकड़ और दंड की निश्चितता: सीवीसी, सीबीआई/एसीबी, लोकपाल/लोकायुक्त, तेज विशेष न्यायालय; चुनौती विलंब है, क़ानून की अनुपस्थिति नहीं।
- ईमानदार की रक्षा: व्हिसल-ब्लोअर आवरण, स्थिर कार्यकाल, दंड पदस्थापन को खेल बनाने का अंत।
- राजनीतिक वित्त और सिविल सेवा बोर्ड सुधार ताकि पदस्थापन कीमत वाला टिकट न हो।
- अंकेक्षण पगडंडी वाले डिजिटल लोक वस्तु — डीबीटी, ई-खरीद — प्लस ऑफलाइन मदद ताकि निरक्षर नया शिकार न बनें।
- शिक्षा और प्रतिष्ठा: विद्यालय जो रिश्वत को चतुराई नहीं, लज्जा मानें; प्रवर्तित व्यावसायिक शपथ।
- मीडिया और नागरिक समाज जो विशाल चोरी नाम दें बिना प्राइम टाइम मुकदमा बने।
- रोज नागरिक इनकार: अधिकार वाले राशन कार्ड के लिये न देना; सुरक्षित हो तो रिश्वत माँग का अभिलेख।
- नैतिक नेतृत्व: मंत्री और विभागाध्यक्ष जो “निपटान” पर मुस्कुराएँ नहीं।
क्या पर्याप्त नहीं होगा
- पत्रावली बिना नारे; नया पोर्टल जिसे अभी दलाल चाहिए; लिपिकों को नैतिक व्याख्यान जब शीर्ष छूट में हो।
- केवल-गरीबी कथा: संपन्न भ्रष्टाचार को संपत्ति, जीवनशैली और हितकारी-स्वामित्व जाँच चाहिए।
Flow diagram
flowchart TD C[भ्रष्टाचार] --> T[न्यास बिका] T --> S[समाज अधिकार को कृपा माने] D[डिजाइन पारदर्शिता दंड] --> P[रोकथाम] E[रोज नागरिक इनकार] --> P
Conclusion
भ्रष्टाचार की चुनौती यह है कि वह गणतंत्र की वायरिंग बदलता है: काउंटर दुकान बन जाता है और नागरिक अपने ही अधिकारों का ग्राहक। रोकथाम डिजाइन प्लस कलंक प्लस निश्चित दंड है — सचिवालय जितना समाज में। जो संस्कृति ईमानदार पर हँसे, उसे एक और परिपत्र नहीं बचाएगा।
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Nishant is a socially sensitive, socialist, intellectual and professor. Through his articles, speeches and media, he raises the voices of labourers, minorities, downtrodden, women and tribals. A party keeps him in its think tank. In this sequence once he calls the members of civil society, intellectuals, politicians and officers to get their children admitted in the government schools. In the season of admissions, the elite schools are highly criticised for their criteria and its impact on education and Nishant also joins in these criticism; meanwhile it comes out that Nishant himself is trying to get his child admitted in an elite school. People condemn this attitude of Nishant and say that his action and words are mismatched.
Question therefore is:
(i) Should Nishant get his child admitted in the government school?
(ii) Should Nishant leave his intellectual discourses?
(iii) Should he call his party followers in his favour?
(iv) Or should he try to get the admission of his child in the elite school? Discuss.
Next question in the 2018 paper (Q15). View answer →
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क्या त्योहार का उपहार सदा भ्रष्टाचार है?
आचरण नियम कई उपहारों को हित संघर्ष मानते हैं। प्रतीक निर्दोष हो सकता है; नियंत्रण अधिकारी को कीमत वाला ‘प्रसाद’ रिश्वत की सामाजिक धुलाई है।
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क्या राजनीति गंदी हो तो समाज साफ हो सकता है?
पूर्णतः नहीं। नागरिक इनकार अभी छोटी बाजारें घटाता है और साफ राजनीति की माँग बनाता है; आवश्यक है, पर्याप्त नहीं।
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