Revision summary
नैतिक केंद्र: सत्य, अहिंसा, साधन-साध्य एकत्व, अंत्योदय, न्यास, सत्याग्रह। सामाजिक केंद्र: स्वराज, सर्वोदय, रचनात्मक कार्य, अस्पृश्यता का अंत, रोटी श्रम, सांप्रदायिक सम्मान। सीमा: अंतःस्वर बिना परीक्षा रह सकता है; धनिकों का परिवर्तन अक्सर गिरता है; दंगे को विधिवत बल चाहिए हो सकता है। प्रशासनिक परीक्षा पत्रावली पर सबसे कमजोर उपयोगकर्ता की गरिमा है।
Model answer
Introduction
गांधी की नीति और उनका सामाजिक कार्यक्रम एक शिल्प हैं: सत्य और अहिंसा निजी मनोदशा नहीं, और स्वराज झंडा नहीं। उनका परीक्षण पूछना है कि वे व्यक्ति और गणतंत्र से क्या माँगते हैं, और कहाँ तनाव है।
Body
नैतिक विचार
- सत्य: वाणी, खोज और लोक जीवन का अनुशासन, आध्यात्मिक नारा नहीं; आश्रम डायरी और समाचारपत्र स्वीकार की कार्यशालाएँ थीं।
- अहिंसा: दूसरे को औजार न मानना, विरोधी सहित; वह लागत के नीचे साहस है, कायरता नहीं, इसलिए उन्होंने अहिंसा को दुर्बलता से अलग किया।
- साधन और साध्य का एकत्व: अन्यायपूर्ण साधन न्यायपूर्ण जीवन नहीं दे सकता; चरखा और नमक यात्रा विधि के रूप में नीति थे, सत्ता कब्जे की बाद की पालिश नहीं।
- साध्य के रूप में व्यक्ति: ‘अंतिम व्यक्ति’ (अंत्योदय) नीति की परीक्षा है; जो सुधार सबसे कमजोर को अपमानित करे बहुमत जीत कर भी गिरता है।
- धन और पद का न्यास: संपत्ति और कुर्सी दूसरों के लिए धारण हैं; लोभ आध्यात्मिक और नागरिक विफलता है।
- आत्म-पीड़ा (तप) नैतिक बल: सत्याग्रह पड़ोसी के शरीर की जगह अपना दांव लगाता है, जो नागरिक प्रतिरोध का नैतिक केंद्र है।
- सीमा: आलोचक कहते हैं नीति संरचनात्मक बल कम आँक सकती है, न्यायपूर्ण युद्ध या दंगा रोकने वाली पुलिस से तनाव रख सकती है, और यदि अंतःस्वर बिना परीक्षा रह जाए तो व्यक्तित्व पंथ बन सकती है।
सामाजिक विचार
- स्वराज व्यक्ति और ग्राम का आत्म-शासन, केवल वायसराय कुर्सी का हस्तांतरण नहीं; हिंद स्वराज की आधुनिक लोभ की आलोचना अभी पूछती है विकास किस लिए है।
- सर्वोदय और रचनात्मक कार्यक्रम: स्वच्छता, खादी, सांप्रदायिक सद्भाव और अस्पृश्यता का अंत दैनिक कार्य के रूप में सामाजिक नीति थे, बाद का मंत्रालय नहीं।
- अस्पृश्यता उन्मूलन और मंदिर प्रवेश: आध्यात्मिक समता को नागरिक गरिमा से जोड़ने वाला सीधा सामाजिक विचार; आंबेडकर का अधिक तीक्ष्ण संवैधानिक पथ गति की आवश्यक आलोचना रहता है।
- रोटी श्रम और शारीरिक कार्य की गरिमा: हाथ के जाति तिरस्कार का सामाजिक उत्तर।
- सांप्रदायिक एकता और सर्वधर्म समभाव: स्वराज की शर्त के रूप में आस्थाओं में समान सम्मान, निजी भक्ति नहीं।
- न्यास बनाम वर्ग युद्ध: उन्होंने पहले विधि के रूप में धनिकों का हृदय-परिवर्तन चाहा, अधिग्रहण नहीं; सामाजिक सीमा यह है कि परिवर्तन अक्सर गिरता है, इसलिए गणतंत्र को भूमि विधि, श्रम विधि और कर अभी चाहिए।
- मामले के लिए तैयार: वह जिला जो बाहर रखी जाति के साथ कुआँ साफ करे, और वह पत्रावली जो पदस्थापना न बेचे, प्रशासनिक वेश में गांधी की नीति और सामाजिक विचार हैं।
Flow diagram
flowchart TD S[सत्य और अहिंसा] --> E[नैतिक व्यक्ति] E --> C[रचनात्मक स्वराज] L[परीक्षा के रूप में अंतिम व्यक्ति] --> C T[न्यास] --> C
Conclusion
गांधी के नैतिक विचार सत्य, अहिंसा, साधन-साध्य एकत्व, परीक्षा के रूप में अंतिम व्यक्ति, और बल के रूप में आत्म-पीड़ा हैं। सामाजिक विचार स्वराज, सर्वोदय, अस्पृश्यता का अंत, रोटी श्रम, सांप्रदायिक सम्मान और न्यास हैं। आलोचनात्मक परीक्षण में जहाँ हृदय-परिवर्तन गिरे वहाँ विधि और संरचना चाहिए, और वे अभी हर उस कुर्सी को जाँचते हैं जो नागरिक को औजार माने।
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Evaluate the relevance of the following in the context of Civil Service:
(a) Conscience
(b) Spirit of service
(c) Discipline
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क्या गांधी ने हर बल ठुकराया?
उन्होंने सत्य की विधि के रूप में हिंसा ठुकराई। उन्होंने कायरता को अहिंसा से अलग रखा, और गणतंत्र को विधिवत पुलिस चाहिए; नैतिक पट्टी निर्दोष को औजार न बनाना है।
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क्या गांधी के सामाजिक विचार केवल ग्रामीण अतीत-मोह हैं?
ग्राम स्वराज रोमानी हो सकता है। टिकाऊ केंद्र श्रम की गरिमा, अपमान का अंत, और वह विकास है जो अंतिम व्यक्ति का सामना कर सके।
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