Revision summary
1991 उदारीकरण ने लाइसेंस-परमिट वर्षों के बाद व्यापार, पूँजी और प्रौद्योगिकी खोली। माल निर्यात विविध हुआ और आईटी सेवाएँ मजबूत अधिशेष बनीं; माल खाता प्रायः घाटे में रहता है। फेमा ने फेरा बदला; एफडीआई पोर्टफोलियो प्रवाह से चिपचिपा है जो तेज पलट सकता है। प्रौद्योगिकी संयुक्त उद्यम और ट्रिप्स-युग नियमों से आयी, पर चिप्स और मॉड्यूल आयात निर्भरता दिखाते हैं। नेट प्रभाव तेज खुली वृद्धि साथ बाहरी और क्षमता जोखिम है।
Model answer
Introduction
1991 के बाद उदारीकरण ने व्यापार, पूँजी और प्रौद्योगिकी खोली जिन्हें लाइसेंस-परमिट अर्थव्यवस्था ने राशन किया था। वैश्वीकरण वह खुलापन है और विश्व उत्पादन व वित्त में भारत का प्रवेश। प्रभाव ऊँची वृद्धि और विकल्प हैं, तथा बाहरी संवेदनशीलता और असमान क्षमता भी।
Body
विदेशी व्यापार
- शुल्क गिरे, मात्रात्मक प्रतिबंध अधिकांशतः समेटे गये, और भारत डब्ल्यूटीओ-युग वस्तु व सेवा बाजार से जुड़ा।
- माल निर्यात अभियांत्रिकी, रसायन, रत्न और बाद में इलेक्ट्रॉनिक्स असेम्बली में विविध हुआ; सेवा निर्यात — विशेषतः आईटी और आईटीईएस — टिकाऊ अधिशेष पंक्ति बना।
- तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और पूँजीगत माल का आयात वृद्धि के साथ बढ़ा, इसलिए माल खाता प्रायः घाटे में रहता है भले सेवाएँ चालू खाते की मदद करें।
- फर्मों को निर्यात अनुशासन से पैमाना और गुणवत्ता मिली; अप्रतिस्पर्धी छोटी इकाइयों ने सस्ता आयात झेला, जो समायोजन है, निःशुल्क भोजन नहीं।
पूँजी प्रवाह
- फेरा की जगह फेमा (1999) आया: चालू-खाता परिवर्तनीयता और प्रबंधित पूँजी खाता ने आपराधिक विदेशी-मुद्रा व्यवस्था बदली।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दीर्घकालिक संयंत्र लाया, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश शेयर और ऋण बाजार तरलता लाया जो जोखिम-बंद सप्ताह में पलट सकता है।
- बाहरी वाणिज्यिक उधार और एनआरआई जमा वित्त मेनू चौड़े करते हैं; वे वैश्विक ब्याज-दर झटके भी आयात करते हैं।
- प्रभाव सस्ती पूँजी और गहरे बाजार हैं, जिनकी कीमत विनिमय-दर और अचानक-रुकाव जोखिम है जिसे 1991 ने स्वयं विज्ञापित किया था।
प्रौद्योगिकी हस्तान्तरण
- संयुक्त उद्यम, एफडीआई और ट्रिप्स-युग पेटेंट नियमों ने ऑटो, फार्मा, दूरसंचार और बाद में नवीकरणीय में प्रक्रिया व उत्पाद ज्ञान का प्रवाह तेज किया।
- रिवर्स इंजीनियरिंग और मजबूत जेनेरिक-फार्मा आधार दिखाते हैं कि हस्तान्तरण केवल बहुराष्ट्रीय उपहार नहीं; घरेलू अवशोषण क्षमता तय करती है क्या टिकता है।
- आयातित चिप्स, मशीन टूल और सौर मॉड्यूल पर निर्भरता दूसरा चेहरा दिखाती है: वैश्वीकरण देश को असेम्बलर पर जमा सकता है जब तक औद्योगिक नीति सीढ़ी न बनाये।
उदारीकरण ने इसलिए अवसर और जोखिम साथ वैश्विक किये। व्यापार, पूँजी और प्रौद्योगिकी सब चले; क्षमता समान नहीं चली।
Flow diagram
flowchart TD L[1991 उदारीकरण] --> T[व्यापार डब्ल्यूटीओ वस्तु सेवा] L --> C[पूँजी एफडीआई एफपीआई फेमा] L --> K[प्रौद्योगिकी एफडीआई ट्रिप्स] T --> G[ऊँची वृद्धि विकल्प] C --> R[अचानक रुकाव जोखिम] K --> A[अवशोषण क्षमता]
Conclusion
वैश्वीकरण और उदारीकरण ने 1991 के बाद भारत का व्यापार, पूँजी और प्रौद्योगिकी खोला। व्यापार बढ़ा और सेवा निर्यात पका; फेमा के अधीन पूँजी सस्ती और अधिक उड़ने वाली बनी; प्रौद्योगिकी एफडीआई और ट्रिप्स से आयी, फिर भी रणनीतिक आयात रह गये। प्रभाव तेज, अधिक खुली वृद्धि है जिसे अभी घरेलू क्षमता चाहिए ताकि चालू खाता और दुकान-फर्श स्थायी उधार न रहें।
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क्या उदारीकरण ने केवल सेवाओं की मदद की?
नहीं। माल व्यापार और ऑटो, फार्मा, दूरसंचार में एफडीआई भी बढ़ा। सेवाएँ सबसे दिखने वाला अधिशेष थीं।
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क्या सारी विदेशी पूँजी एक समान है?
नहीं। एफडीआई दीर्घकालिक है। पोर्टफोलियो प्रवाह और छोटा ऋण वैश्विक डर में निकल सकते हैं।
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