Revision summary
भारत जम्मू-कश्मीर को 1947 अधिमिलन के बाद संघ का अभिन्न विषय मानता है। शिमला 1972 और बाद के द्विपक्षीय पाठ मध्यस्थ के बिना शांतिपूर्ण निपटारा चाहते हैं। मध्यस्थता उस विषय को अंतरराष्ट्रीय बनाएगी जिसे नई दिल्ली अब आंतरिक संवैधानिक और सुरक्षा मुद्दा कहती है। पाकिस्तान आतंक और शांति की वार्ता का प्रतिपक्ष है, भारतीय क्षेत्र पर सह-संप्रभु नहीं। इसलिए भारत संयुक्त राष्ट्र, महाशक्ति या अन्य शुभकार्य सूत्रों को नकारता है जो कश्मीर समाधान लिखें।
Model answer
Introduction
भारत जम्मू-कश्मीर को संघ का अभिन्न अंग और पाकिस्तान के साथ विवाद को द्विपक्षीय विषय मानता है। मध्यस्थता का विरोध अधिमिलन, बाद के द्विपक्षीय दस्तावेजों, और इस दावे से आता है कि तीसरा पक्ष आंतरिक संवैधानिक विषय को अंतरराष्ट्रीय बना देगा।
Body
कानूनी और संधि आधार
- 26 अक्टूबर 1947 के अधिमिलन पत्र ने रियासत को भारतीय अधिराज्य में लाया; नई दिल्ली बाद के संयुक्त राष्ट्र संदर्भों को पाकिस्तान द्वारा सेना न हटाने से जमे हुए पढ़ती है, समाधान मध्यस्थता का स्थायी निमंत्रण नहीं।
- शिमला समझौता, 1972, और लाहौर घोषणा, 1999, दोनों देशों को शांतिपूर्ण द्विपक्षीय साधनों से मतभेद निपटाने के लिए बाध्य करते हैं, जिन्हें भारत संयुक्त राष्ट्र, महाशक्ति या ट्रैक-टू मध्यस्थता को वार्ता का विकल्प बनाने से रोकने के रूप में उद्धृत करता है।
- 2019 में राज्य के संघ राज्यक्षेत्रों में पुनर्गठन के बाद भारत ने दोहराया है कि मध्यस्थता योग्य कोई अंतरराष्ट्रीय विवाद शेष नहीं, केवल सीमा-पार आतंक और संघ के भीतर सामान्य राजनीति की बहाली है।
राजनीतिक और सुरक्षा आधार
- मध्यस्थता उस पक्ष के हाथ में वीटो रखेगी जिस पर भारत प्रॉक्सी उपयोग का आरोप लगाता है, और उस विषय को अंतरराष्ट्रीय बनाएगी जिसे भारतीय लोक विधि अब संघ राज्यक्षेत्र प्रश्न मानती है।
- तीसरे पक्ष के सूत्रों ने ऐतिहासिक रूप से जनमत-संग्रह भाषा को अधूरी विसैन्यीकरण से मिलाया, जिसे भारत असमान और क्षेत्र में क्रमिक चुनावों से व्यक्त इच्छा की उपेक्षा मानकर नकारता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता भी ऐसे संरक्षक को बुलाने के विरुद्ध है जो फिर भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर स्थायी सीट का दावा करे।
भारत अभी क्या स्वीकार करता है
- भारत हर संपर्क नहीं ठुकराता: बैक-चैनल और द्विपक्षीय कूटनीति खुली रहती है, पर केवल दो संप्रभुओं की वार्ता के रूप में, मध्यस्थता या शुभकार्य के रूप में नहीं जो कश्मीर का नक्शा लिखे।
Flow diagram
flowchart TD A[अधिमिलन पत्र 1947] --> B[आंतरिक संघ विषय] S[शिमला 1972 द्विपक्षीय] --> B B --> X[तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं] T[आतंक और वार्ता] --> P[केवल पाकिस्तान प्रतिपक्ष]
Conclusion
भारत कश्मीर पर मध्यस्थता इसलिए नकारता है कि अधिमिलन, शिमला और बाद के द्विपक्षीय पाठ विषय को दो-पक्षीय बनाते हैं, जबकि मध्यस्थ आंतरिक संवैधानिक निपटारे को अंतरराष्ट्रीय सौदे में जमा देगा। पाकिस्तान से वार्ता वर्जित नहीं; मेज पर तीसरी कुर्सी वर्जित है।
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क्या भारत ने कभी कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र भूमिका स्वीकार की?
भारत ने 1948 में विषय को आक्रमण शिकायत के रूप में संयुक्त राष्ट्र ले गया। शिमला के बाद वह बाद के संयुक्त राष्ट्र शुभकार्य को स्थायी मध्यस्थता जनादेश नहीं मानता।
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क्या अमेरिकी या रूसी मध्यस्थ भारत को स्वीकार्य है?
नहीं। भारत कश्मीर पर किसी तीसरे देश की मध्यस्थता नकारता है, रणनीतिक साझेदारों से भी, जबकि पाकिस्तान से द्विपक्षीय वार्ता खुली रखता है।
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