Revision summary
तिलक 1881 से केसरी (मराठी) और मराठा (अंग्रेजी) को राष्ट्रवादी संगठन की तरह प्रयोग करते हैं। 1897 का रैंड-प्लेग मुकदमा और 1908 का मांडले दंड उन्हें प्रमुख प्रेस बंदी बनाते हैं। धारा 124A हिंसा पर नहीं, राजनीतिक टिप्पणी पर गैग के रूप में दिखाई देती है। होम रूल बाद में उन्हीं पत्रों को जन स्वराज शिक्षण में ले जाता है। प्रेस स्वतंत्रता उनके लिए राजनीतिक अधिकार है, व्यावसायिक विशेषाधिकार नहीं।
Model answer
Introduction
बाल गंगाधर तिलक ने समाचारपत्र को राजनीतिक पाठशाला और औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध अधिकार माना। प्रेस स्वतंत्रता में उनका योगदान केसरी और मराठा, दो राजद्रोह मुकदमे, और शासन पर टिप्पणी को स्वराज कार्य मानने वाला सार्वजनिक बचाव है।
Body
राजनीतिक उपकरण के रूप में पत्र
- तिलक और सहयोगियों ने 1881 में मराठी में केसरी और अंग्रेजी में मराठा निकाले, ताकि राष्ट्रवादी तर्क देशी पाठकों और अंग्रेजी-शिक्षित परत दोनों तक पहुँचे।
- प्लेग उपायों, कांग्रेस और स्वराज पर संपादकीय ने प्रेस को केवल समाचार नहीं, संगठन बनाया, इसलिए राज्य ने उनके पत्रों को राजनीतिक खतरा माना।
- उन्होंने कहा कि अधीन जनता को अधिकारियों की मुद्रित आलोचना करनी चाहिए; यही दावा उनके प्रेस-स्वतंत्रता संघर्ष का केंद्र है।
राजद्रोह मुकदमे और कानून
- 1897 में पुणे प्लेग अधिकारी रैंड की हत्या के बाद केसरी लेखों से धारा 124A के अधीन राजद्रोह दोष और अठारह महीने का कारावास हुआ; मुकदमे ने दिखाया कि राजनीतिक टिप्पणी को विद्वेष मानकर दंडित किया जा सकता है।
- 1908 में मुजफ्फरपुर बम के बाद केसरी लेखन पर छह वर्ष का दंड और मांडले निर्वासन मिला, जिससे वह उग्र चरण के सबसे प्रसिद्ध प्रेस बंदी बने।
- मुकदमों ने 124A और देशी प्रेस नियंत्रण की विरासत को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया; तिलक का न्यायालय और पत्र साथ सिखाते हैं कि स्वराज में विरोध छापने का अधिकार शामिल है।
- बाद में होम रूल ने उन्हीं पत्रों से “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” फैलाया, इसलिए प्रेस स्वतंत्रता और जन राजनीति एक अभियान रहे।
Flow diagram
flowchart TD T[तिलक] --> K[केसरी मराठा 1881] K --> S[राजद्रोह 1897 1908] S --> L[धारा 124A] K --> H[होम रूल स्वराज]
Conclusion
तिलक का योगदान द्विभाषी राष्ट्रवादी पत्र, 1897 और 1908 के राजद्रोह दोष जो धारा 124A को उजागर करते हैं, और राज पर टिप्पणी को राजनीतिक अधिकार सिखाना है। उनके हाथ में प्रेस स्वतंत्रता व्यापार माँग नहीं, स्वराज की विधि थी।
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क्या तिलक केवल व्यावसायिक प्रेस स्वतंत्रता माँगते थे?
नहीं। उन्होंने पत्र को राष्ट्रवादी पाठशाला और अधिकारियों की आलोचना का अधिकार माना, इसलिए राजद्रोह कानून उनके विरुद्ध लगा।
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क्या केसरी और मराठा एक ही पत्र थे?
नहीं। केसरी मराठी और मराठा अंग्रेजी थे, 1881 में दो पाठक वर्गों तक पहुँचने के लिए साथ निकाले गए।
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