Revision summary
ग्रीनहाउस गैसें दीर्घ-तरंग विकिरण रोकती हैं; 1850 के बाद की वृद्धि मुख्यतः मानवजनित है। आईपीसीसी अभिलेख बर्फ हानि, महासागर ऊष्मा और समुद्र-स्तर वृद्धि अंगुलिछाप दिखाते हैं। भारत हिमनद, मानसून, तटीय और ऊष्मा-श्रम जोखिम झेलता है, गंगा मैदान सहित। यूएनएफसीसीसी, क्योटो और पेरिस वैश्विक उत्तर गढ़ते हैं; एनएपीसीसी और पंचामृत भारत के हैं। न्यूनीकरण और अनुकूलन साथ चलने चाहिए।
Model answer
Introduction
भू-मंडलीय उष्मन पृथ्वी के औसत सतही तापमान की दीर्घकालिक वृद्धि है, मुख्यतः मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों से। टिप्पणी को भौतिक तंत्र को मौसम से अलग करना चाहिए, फिर बर्फ, समुद्र स्तर और भारतीय मानसून पर प्रभाव तथा यूएनएफसीसीसी-पेरिस प्रतिक्रिया दर्ज करनी चाहिए।
Body
तंत्र और साक्ष्य
- जीवाश्म ईंधन और भूमि-उपयोग से कार्बन डाइऑक्साइड, पशु, धान और जीवाश्म रिसाव से मीथेन, उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड, तथा औद्योगिक फ्लुओरिनेटेड गैसें निर्गामी दीर्घ-तरंग विकिरण रोकती हैं — वर्धित ग्रीनहाउस प्रभाव।
- आईपीसीसी आकलन चक्र दिखाते हैं कि 1850 के बाद की उष्णता केवल सौर या ज्वालामुखी बल से नहीं समझाई जाती; पिछला दशक यंत्रीय अभिलेख का सबसे गर्म रहा है।
- प्रेक्षित संकेत हैं पर्वतीय हिमनदों की पीछे हट, आर्कटिक समुद्री बर्फ हानि, महासागर ऊष्मा सामग्री वृद्धि, तथा तापीय विस्तार और बर्फ पिघल से वैश्विक माध्य समुद्र-स्तर वृद्धि।
- चरम ऊष्मा लहरें, भारी अल्पकालिक वर्षा और लंबी शुष्क अवधि उसी माध्य उष्णता का वितरणात्मक चेहरा हैं, इसलिए ‘भू-मंडलीय उष्मन’ चरम की कथा भी है।
भारत, समता और प्रतिक्रिया
- भारत के लिए जोखिम हैं गंगा-ब्रह्मपुत्र-सिंधु को पालने वाले हिमालयी हिमनद हानि, मानसून अनियमितता, पूर्व-पश्चिम तट बाढ़, तथा सिंधु-गंगा मैदान में श्रम और गेहूँ पर ऊष्मा तनाव, उत्तर प्रदेश सहित।
- यूएनएफसीसीसी (1992), क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौता (2015) साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व फ्रेम करते हैं; पेरिस राष्ट्रीय निर्धारित योगदान और 2°C से काफी नीचे / 1.5°C प्रयास माँगता है।
- भारत की जलवायु परिवर्तन राष्ट्रीय कार्य योजना (2008) के आठ मिशन, बाद के अद्यतन, और 2021 ग्लासगो पंचामृत (500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता, 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म बिजली, 1 अरब टन उत्सर्जन कमी, 45 प्रतिशत तीव्रता कटौती, 2070 नेट-ज़ीरो) घरेलू टिप्पणी हैं।
- न्यूनीकरण (कोयला शिखर, नवीकरणीय, दक्षता) और अनुकूलन (ऊष्मा कार्य योजना, जलवायु-सहिष्णु कृषि, तटीय विनियमन) साथ चलने चाहिए; केवल ध्रुवीय भालू नाम देने वाली टिप्पणी गंगा किसान चूक जाती है।
Flow diagram
flowchart TD G[CO2 CH4 N2O F-गैस] --> W[वैश्विक माध्य उष्मन] W --> I[बर्फ पिघल समुद्र स्तर चरम] W --> M[मानसून हिमालय ऊष्मा] P[यूएनएफसीसीसी पेरिस एनएपीसीसी] --> R[न्यूनीकरण अनुकूलन]
Conclusion
भू-मंडलीय उष्मन वर्धित ग्रीनहाउस बल है, पहले से बर्फ, महासागर और चरम में दृश्य। भारत का दाव जल, भोजन और ऊष्मा है; विधिपूर्ण उत्तर पेरिस एनडीसी और एनएपीसीसी मिशन हैं, ग्रह गर्म हो रहा है या नहीं यह विवाद नहीं।
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क्या भू-मंडलीय उष्मन ओजोन छिद्र के समान है?
नहीं। ओजोन क्षय समतापमंडलीय क्लोरीन-ब्रोमीन समस्या है (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल)। उष्मन क्षोभमंडलीय ग्रीनहाउस बल है। वे अंतःक्रिया करते हैं किंतु एक नहीं।
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क्या ठंडी सर्दी उष्मन खंडित करती है?
नहीं। उष्मन बहु-दशकीय वैश्विक माध्य है। गर्म जलवायु में क्षेत्रीय ठंड अभी हो सकती है, और चरम बढ़ सकते हैं।
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