Q11 · UPPSC PCS मुख्य परीक्षा 2018 · GS I · 12 अंक · कक्ष में ~200 शब्द · 2 min read

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'200 वर्षों के ब्रिटिश शासन ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मेरुदण्ड की क्षमता को क्षीण कर दिया था।' व्याख्या कीजिए।

विषय: Modern Indian history. पाठ्यक्रम: Modern Indian history from A.D. 1757 to A.D. 1947 — significant events, personalities and issues. वही आधिकारिक प्रश्न वर्ष 2018 और Modern Indian history से।

Revision summary

भूमि बंदोबस्त और नकदी फसलों ने किसान को राजस्व और निर्यात मशीन बनाया। अकाल दिखाते हैं कि देहात अभी राज चुकाते हुए अनाज खो सकता था। हथकरघा नगर लंकाशायर और मुक्त-व्यापार नियमों के नीचे वस्त्र मेरुदण्ड खो बैठे। व्यापार ने भारत को कच्चे निर्यात और ब्रिटिश निर्मित माल में बंद किया। नौरोजी की निकासी, होम चार्ज और युद्ध वित्त ने राजकोषीय चोट पूरी की। रेलों ने रसद आधुनिक की बिना आत्म-केंद्रित औद्योगिक आधार लौटाए।

Model answer

Introduction

दादाभाई नौरोजी, आर. सी. दत्त और बाद के राष्ट्रवादी अर्थशास्त्रियों ने भूमि, शिल्प और धातु को पूर्व-औपनिवेशिक भारत की मेरुदण्ड कहा। कंपनी और क्राउन के दो सौ वर्षों ने भारत को कच्चे माल का खेत और बंदी बाजार बनाकर उस मेरुदण्ड को मोड़ा, इसलिए चोट संरचनात्मक थी, केवल अकाल-शृंखला नहीं।

Body

कृषि और ग्रामीण मेरुदण्ड

  • स्थायी, रैयतवारी और महलवारी बंदोबस्तों ने किसान को राजस्व इंजन बनाया; ऊँची, अनम्य नकद माँग ने महाजनी ऋण और बंगाल, मद्रास तथा संयुक्त प्रांत के बड़े भागों में दखल की हानि को बाध्य किया।
  • वाणिज्यीकरण ने नील, अफीम, कपास, पटसन और गन्ने को उन खेतों पर धकेला जहाँ मिश्रित अन्न था, इसलिए स्थानीय खाद्य सुरक्षा पतली हुई जबकि निर्यात खाते मोटे हुए।
  • सिंचाई और रेल साम्राज्य के, किसान के नहीं, मानचित्रों का अनुसरण करती थीं: नहरें कॉलोनी और नकदी फसल को सेवा देती थीं; रेलें अकाल वर्षों में राहत जितनी बार अनाज बाहर भी ले जाती थीं।
  • 1770 बंगाल से 1896–1900 तक उन्नीसवीं सदी के बार-बार अकाल एक ऐसे देहात को दिखाते हैं जो लिवरपूल के लिए अधिशेष उगा सकता था और घर पर भूखा रह सकता था।

उद्योग, व्यापार और नगरीय मेरुदण्ड

  • भारतीय वस्त्र भारतीय और विदेशी बाजार कपड़ा देते थे; लंकाशायर शुल्क, कंपनी के व्यापार एकाधिकार की समाप्ति के बाद ‘मुक्त व्यापार’, और मशीन कपड़े ने ढाका, मुर्शिदाबाद और सूरत के हथकरघा नगर गिराए।
  • विऔद्योगीकरण हर करघे की मृत्यु नहीं था, किंतु श्रम की भीड़ भरे देहात की ओर वापसी और नगरीय शिल्प पूँजी की हानि थी, जिसे आधुनिक कारखाना क्षेत्र राज के अंत तक पूरी तरह नहीं भर पाया।
  • भारत कच्चा कपास, चमड़ा, चाय और अफीम निर्यात करता था और ब्रिटिश निर्मित माल आयात करता था, इसलिए व्यापार पैटर्न ने उपनिवेश को साम्राज्य श्रम-विभाजन की तली पर बंद किया।
  • रेल, भाप और प्रबंध-एजेंसी घर ने आधुनिक परत बनाई जो निष्कर्षण रसद को भारतीय पूँजी-गत आधार से अधिक सेवा देती थी।

निकासी, वित्त और उत्तर राज

  • होम चार्ज, स्टर्लिंग वेतन, काउंसिल बिल और अप्रतिफलित निर्यात वह निकासी थी जिसे नौरोजी ने नापा: भारतीय करों ने साम्राज्य सीमाओं पर प्रयुक्त भारतीय सेना और लंदन प्रतिष्ठान चुकाया।
  • स्वर्ण-विनिमय मानक और युद्धकालीन मुद्रास्फीति (1914–18, 1939–45) ने क्रय शक्ति स्थानांतरित की; 1943 बंगाल अकाल युद्ध वित्त, इनकार नीति और अक्षम ग्रामीण मेरुदण्ड पर बैठा।
  • न्यायपूर्ण व्याख्या इसलिए 1757–1947 को भूमि, शिल्प और राजकोषीय स्वायत्तता की लंबी चोट मानती है, इस सरल कथा नहीं कि रेलों ने निकासी रद्द कर दी।

Flow diagram

flowchart TD
  L[भूमि राजस्व नकदी फसल] --> P[किसान ऋण अकाल]
  C[शिल्प पतन मुक्त व्यापार] --> U[विऔद्योगिक श्रम]
  D[निकासी होम चार्ज] --> S[मुड़ी आर्थिक मेरुदण्ड]

Conclusion

ब्रिटिश शासन ने खेत पर भारी लगान, शिल्प नगर तोड़कर और अधिशेष लंदन भेजकर भारत की आर्थिक मेरुदण्ड क्षीण की। आधुनिक परिवहन और पतला मिल क्षेत्र आत्म-केंद्रित अर्थव्यवस्था नहीं लौटाए; स्वतंत्रता ने वह मुड़ी संरचना विरासत में ली।

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    रेल वास्तविक आधुनिक संपत्ति थीं, किंतु वे सेना, कपास और अनाज निर्यात मार्गों के लिए बिछाई गईं। रसद का विकास टूटी औद्योगिक और कृषि मेरुदण्ड लौटाना नहीं है।

  • क्या चोट केवल कंपनी-काल लूट थी?

    लूट कंपनी से शुरू हुई, किंतु क्राउन-काल भूमि कानून, मुक्त व्यापार, निकासी और दो विश्व युद्ध उसी निष्कर्षण पैटर्न को 1947 तक चलाते रहे।

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