Revision summary
समावेशी विकास का अर्थ है गरीब, महिलाएँ और पिछड़े क्षेत्र जीडीपी बाँटें, केवल ऊँचा औसत नहीं। 1991 के बाद वृद्धि plus पीडीएस, मनरेगा, आरटीई और एनएफएसए ने निराश्रितता काटी और उपभोग फर्श बनाया। लगभग 0.35 की उपभोग गिनी मध्यम है; संपत्ति और नियमित नौकरियाँ अधिक असमान हैं। नौकरी-पतली अनौपचारिक वृद्धि और क्षेत्रीय अंतर दिखाते हैं वितरण न्याय अधूरा है। अंतरण ने कैलोरी मदद की; परिसंपत्तियाँ और सम्मानजनक काम अभी तय करते हैं समावेश टिकता है या नहीं।
Model answer
Introduction
समावेशी विकास वह वृद्धि है जिसके फल गरीब, महिला, एससी/एसटी और पिछड़े जिलों तक पहुँचें — केवल ऊँचा राष्ट्रीय जीडीपी नहीं। 1991 के बाद भारत ने तेज वृद्धि plus अधिकार-और-अंतरण फर्श (भोजन, काम, स्कूल, बाद में स्वास्थ्य) चुना। समानता और वितरण न्याय कथित नैतिकता थे। सफलता आंशिक है: चरम निराश्रितता गिरी, पर नियमित नौकरियाँ, संपत्ति और क्षेत्रीय अंतर उसी घड़ी पर नहीं बंद हुए।
Body
नीति ने क्या वादा किया
- समानता के साथ वृद्धि का अर्थ है गरीब आय और सार्वजनिक वस्तुएँ पाएँ, केवल औसत उठे नहीं।
- भारतीय योजना भाषा में वितरण न्याय कर-और-अंतरण, भूमि और काश्तकारी, तथा आरक्षित सार्वजनिक अवसर है — जाति और लिंग के नीचे फर्श, सोवियत मजदूरी नहीं।
- समावेशी विकास उसी फाइल का 2000 का नाम है: रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवाज, नियति के रूप में टपकन नहीं।
कितनी दूर सफल रही
- गरीबी और उपभोग: उच्च वृद्धि दशकों ने मानक सर्वेक्षण पाठ पर चरम गरीबी काटी; पीडीएस, स्कूल भोजन और बाद का डीबीटी पतली मजदूरी को भोजन और ईंधन तक खींचते हैं।
- अधिकार फर्श: मनरेगा ने ग्रामीण मजदूरी फर्श रखा; आरटीई और मध्याह्न भोजन ने स्कूल उपस्थिति उठाई; एनएफएसए ने अनाज कानूनी दावा बनाया।
- मानव विकास: साक्षरता, टीकाकरण और दीर्घायु एक पीढ़ी में सुधरे, जो क्षमता के रूप में समावेश है, केवल रुपये के रूप में नहीं।
- लगभग 0.35 की उपभोग गिनी मध्यम दिखती है; वह समान संपत्ति या समान नियमित नौकरियों के बराबर नहीं।
जहाँ न्याय पिछड़ा
- नौकरी-पतली वृद्धि: उत्पादन और सूचीबद्ध-फर्म लाभ नियमित पेरोल से आगे निकले; अधिकांश काम अनौपचारिक रहा, बिना बीमारी छुट्टी या पेंशन।
- संपत्ति, शहरी भूमि और शीर्ष आय उपभोग से तेज संकेन्द्रित हुईं; परिसंपत्ति की समानता कैलोरी की समानता से नहीं मिली।
- क्षेत्रीय और सामाजिक अंतर: वर्षा-आधारित जिले, आदिवासी पट्टी और अवैतनिक देखभाल में महिलाएँ वृद्धि कहानी की स्वतः सह-मालिक नहीं बनीं।
- कृषि संकट और अनौपचारिक शहरी किराया मजदूरी लाभ का टुकड़ा खा गए; अंतरण असफल मानसून या गायब कारखाने की पूरी भरपाई नहीं कर सकता।
- कर प्रगतिशीलता और रिसाव-रहित अंतिम-मील वितरण अधूरे हैं, इसलिए वितरण न्याय अभी रिसाव वाला पाइप है।
समानता-के-साथ-वृद्धि ने इसलिए मोटा उपभोग फर्श और पतली निराश्रितता दी। उसने पूर्व-एशियाई शैली नौकरी-समृद्ध समानता नहीं दी। जब तक नियमित काम और परिसंपत्तियाँ न फैलें समावेशी विकास चलता लक्ष्य है।
Flow diagram
flowchart TD G[1991 के बाद तेज जीडीपी] --> F[पीडीएस मनरेगा आरटीई फर्श] F --> I[कम निराश्रितता] G --> J[नौकरी-पतला अनौपचारिक काम] W[संपत्ति भूमि शीर्ष आय] --> U[असमान परिसंपत्ति] I --> P[आंशिक समावेश] J --> P U --> P
Conclusion
भारत की समानता-के-साथ-वृद्धि नीति ने समावेशी विकास आंशिक पूरा किया: गरीबी और भूख जोखिम गिरे, और अधिकार-आधारित पीडीएस, मनरेगा और स्कूल कार्यक्रमों ने फर्श बनाया। आंशिक असफल रही: अनौपचारिक नौकरियाँ, संपत्ति संकेन्द्रण और क्षेत्रीय अंतर रह गए। लगभग 0.35 की उपभोग गिनी बंद न्याय फाइल नहीं है।
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क्या तेज जीडीपी ने भारत को स्वतः बराबर किया?
नहीं। निराश्रितता गिरी, पर संपत्ति और नियमित नौकरियाँ तिरछी रहीं। अंतरण ने अंतर का भाग भरा।
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क्या लगभग 0.35 गिनी वितरण न्याय का प्रमाण है?
नहीं। वह मध्यम उपभोग आँकड़ा है। परिसंपत्ति असमानता और अनौपचारिकता कठिन परीक्षाएँ रहती हैं।
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