Q3 · UPPSC PCS मुख्य परीक्षा 2019 · GS III · 8 अंक · कक्ष में ~125 शब्द · 2 min read

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भारतीय संसद के 'सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम' की आलोचना राज्यों द्वारा इसकी कठोरता एवं कभी-कभी असंवैधानिकता के लिये की जाती है। विश्लेषणात्मक परीक्षण कीजिए।

विषय: Economic planning and NITI Aayog. पाठ्यक्रम: Economic planning in India: objectives and achievements. Role of NITI Aayog, Pursuit of Sustainable Development Goals (SDGs). वही आधिकारिक प्रश्न वर्ष 2019 और Economic planning and NITI Aayog से।

Revision summary

एएफएसपीए 1958 अशांत क्षेत्र अधिसूचित कर सशस्त्र बलों को गोली, तलाशी और गिरफ्तारी देता है। धारा 6 पूर्व मंजूरी व्यवहार में उन्मुक्ति कही जाती है। राज्य कहते हैं विधि-व्यवस्था उनकी है, फिर भी सेना वर्षों पुलिसिंग पर चढ़ती है। एनपीएमएचआर 1997 ने सुरक्षाबंध के साथ अधिनियम बरकरार रखा; ईईवीएफएएम 2016 ने मुठभेड़ उन्मुक्ति नकारी। जीवन रेड्डी 2005 ने अधिनियम अत्यंत व्यापक पाया; कागज की वैधता जमीन के न्याय के बराबर नहीं।

Model answer

Introduction

सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम, 1958, केंद्र को ‘अशांत क्षेत्र’ अधिसूचित कर सशस्त्र बलों को गोली, तलाशी और गिरफ्तारी की व्यापक शक्ति देता है। कई पूर्वोत्तर राज्य, और पहले पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर समानांतर क़ानून के अधीन, इसे कठोर कहते हैं क्योंकि रोजमर्रा नागरिक स्वतंत्रता दिनों नहीं, वर्षों के लिए हट जाती है।

Body

अधिनियम क्या करता है

  • क्षेत्र अशांत घोषित होने पर कमीशंड अधिकारी विधि-व्यवस्था के विरुद्ध कार्य करते व्यक्ति पर गोली चला सकता है, आश्रय नष्ट कर सकता है, बिना वारंट गिरफ्तार और संदेह पर परिसर तलाश सकता है।
  • धारा 6 सशस्त्र बल सदस्य पर अभियोजन के लिए पूर्व केंद्रीय मंजूरी माँगती है, जिसे आलोचक व्यवहार में उन्मुक्ति पढ़ते हैं।
  • अधिसूचना दशकों चल सकती है; ‘अस्थायी’ आपातकालीन शक्तियाँ पूरे राज्य या जिले का साधारण क़ानून बन जाती हैं।

राज्य इसे कठोर और असंवैधानिक क्यों कहते हैं

  • राज्य सरकारें तर्क देती हैं कि विधि-व्यवस्था राज्य सूची विषय है, फिर भी एएफएसपीए पुलिसिंग पर सेना सिद्धांत चढ़ाता है और स्थानीय मजिस्ट्रेट व पुलिस जवाबदेही किनारे करता है।
  • मणिपुर, नागालैंड और जम्मू-कश्मीर में बलात् गायब, फर्जी मुठभेड़ और यौन हिंसा शिकायतों ने अधिनियम को अंतिम उपाय नहीं, लाइसेंस जैसा दिखाया।
  • अनुच्छेद 21 (जीवन और दैहिक स्वतंत्रता) और संघीय वितरण तब खोखले कहे जाते हैं जब नागरिक को त्वरित स्वतंत्र जाँच न मिले।
  • नागरिक समाज और कुछ विधानसभाओं ने न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी समिति (2005) का हवाला देकर निरसन या सूर्यास्त माँगा, जिसने एएफएसपीए को अत्यंत व्यापक कहा।

संवैधानिक प्रतिभार

  • नागा पीपुल्स मूवमेंट ऑफ ह्यूमन राइट्स बनाम भारत संघ (1997) में उच्चतम न्यायालय ने एएफएसपीए को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया पर सुरक्षाबंध जोड़े: अशांत-क्षेत्र अधिसूचना की आवधिक समीक्षा, करें-न-करें सूची, और व्यापक गोली-मारो नहीं।
  • एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल एक्जीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज असोसिएशन बनाम भारत संघ (2016) ने कहा कि फर्जी मुठभेड़ पर सेना को उन्मुक्ति नहीं; प्रत्येक कथित法ेतर हत्या की जाँच हो।
  • ईमानदार विश्लेषणात्मक मध्य यह है कि क़ानून कागज पर वैध रहकर भी उस जिले में असह्य हो सकता है जहाँ समीक्षा कभी न हो और विचारण मंजूरी लगभग कभी न मिले।

Flow diagram

flowchart TD
  A[एएफएसपीए 1958] --> D[अशांत क्षेत्र अधिसूचना]
  D --> P[गोली तलाशी गिरफ्तारी शक्ति]
  D --> I[धारा 6 पूर्व मंजूरी]
  P --> C[राज्य आलोचना कठोर]
  I[I] --> C[C]
  C --> SC[एनपीएमएचआर 1997 सुरक्षाबंध के साथ वैध]
  C --> EJ[ईईवीएफएएम 2016 फर्जी मुठभेड़ उन्मुक्ति नहीं]

Conclusion

राज्यों की आलोचना संघीय और अधिकार-आधारित है: एएफएसपीए राज्य विषय को सैन्य बनाता है, बहुत लंबा चलता है, और धारा 6 उपचार रोकती है। उच्चतम न्यायालय ने इसे रद्द नहीं किया, पर हत्या का लाइसेंस भी नहीं दिया। अधिनियम तभी बचाव योग्य है जहाँ अशांति वास्तविक हो, अधिसूचना समीक्षित हो, और दंड प्रक्रिया मृत अक्षर न हो।

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    नहीं। 1997 में सुरक्षाबंध के साथ बरकरार रखा। बाद के मामलों ने फर्जी मुठभेड़ पर उन्मुक्ति नहीं दी।

  • क्या आलोचना केवल नागरिक समाज की है, राज्यों की नहीं?

    पूर्वोत्तर की कई राज्य सरकारों और विधानसभाओं ने भी वहाँ वापसी या निरसन माँगा जहाँ वे अशांति समाप्त मानती हैं।

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