Revision summary
1991 के एलपीजी सुधार व्यापार व पूँजी खोले और भारत के वर्तमान वैश्वीकरण का सामान्य आरंभ हैं। आईटी और प्रवासी विप्रेषण ने नया मध्य वर्ग व ग्राम आय दी; अनौपचारिक व गिग श्रम ने असुरक्षा फैलाई। मीडिया और ब्रांड ने उपभोग संकर किया जबकि जाति व नातेदारी ढली, वैवाहिक साइटों सहित। असमान वृद्धि, कृषि तनाव और डिजिटल पहचान राजनीति उसी सामाजिक परिवर्तन का दूसरा मुख हैं।
Model answer
Introduction
भारत में वैश्वीकरण सामान्यतः 1991 में नरसिंह राव सरकार और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के अधीन व्यापार, निवेश और विदेशी मुद्रा के उदारीकरण से जोड़ा जाता है। सामाजिक प्रभाव की चर्चा में नया श्रम, नया उपभोग और नई दरारें एक साथ आने चाहिए।
Body
श्रम, वर्ग और नगर
- सूचना प्रौद्योगिकी, व्यवसाय-प्रक्रिया कार्य और विशेष आर्थिक क्षेत्रों ने बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम और पुणे में अंग्रेजी-मुखी मध्य वर्ग बनाया, जो वैश्विक समय-क्षेत्रों से बँधा है।
- संगठित कारखाना रोजगार अनौपचारिक और ठेका श्रम से धीमा बढ़ा; ठेका और गिग अर्थव्यवस्था ने जहाँ मजदूरी बढ़ी वहाँ भी असुरक्षा फैलाई।
- खाड़ी और व्यापक प्रवास से विप्रेषण ने ग्राम आवास, विवाह व्यय और स्थानीय प्रतिष्ठा बदली, विशेषकर केरल, पंजाब तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार के भागों में।
संस्कृति, मीडिया और परिवार
- उपग्रह टेलीविजन, बाद में इंटरनेट और स्मार्टफोन ने वैश्विक ब्रांड, मीडिया उद्योग के रूप में क्रिकेट, और उपभोक्ता युवा संस्कृति छोटे नगरों तक पहुँचाई।
- आहार, वस्त्र और त्योहार संकर हुए: शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स जाति पंचायतों व मंदिर न्यासों के साथ बैठते हैं।
- महानगरों में एकल और दो-कमाई घर बढ़े, जबकि नातेदारी, व्यवस्थित विवाह और जाति अंतर्विवाह समाप्त होने के स्थान पर ढले; वैवाहिक वेबसाइटें अक्सर जाति से छानती हैं।
- सेवाओं और निर्यात कारखानों में स्त्रियों का वैतनिक कार्य बढ़ा, किंतु अवैतनिक देखभाल और सार्वजनिक स्थान की सुरक्षा सीमित हैं, जैसा 2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार बहस ने वैश्विक मीडिया चौखट में दिखाया।
असमानता, कृषि तनाव और पहचान
- 1991 के बाद वृद्धि असमान रही: तटीय और दक्षिणी राज्य आगे निकले; वर्षाश्रित कृषि सस्ते आयात, मूल्य अस्थिरता और किसान आंदोलनों से मिली, जिनमें 2020–21 शामिल हैं।
- वैश्वीकरण ने विश्वनागरिक पहचान और रक्षात्मक पहचान राजनीति दोनों तेज कीं — हिंदुत्व, क्षेत्रीय गर्व और अल्पसंख्यक चिंता उन्हीं डिजिटल मंचों पर चलते हैं।
- स्वास्थ्य और शिक्षा में जो भुगतान कर सकते हैं उनके लिए निजी अंतरराष्ट्रीयकृत आपूर्ति दिखी, जबकि गरीब अभी भी कम वित्त वाले राज्य तंत्र पर निर्भर हैं।
Flow diagram
flowchart TD G[एलपीजी 1991] --> W[आईटी अनौपचारिक प्रवास] G --> C[मीडिया संकर संस्कृति] G --> I[असमानता पहचान] W --> S[भारतीय समाज] C[C] --> S[S] I[I] --> S[S]
Conclusion
वैश्वीकरण ने आईटी श्रम, प्रवासी धन, मीडिया और संकर संस्कृति से भारतीय समाज को नया रूप दिया। उसी प्रक्रिया ने क्षेत्रीय व वर्गीय अंतर बढ़ाए और जाति, लिंग व आस्था को तेज बाजार में पुनर्समझौता करने पर बाध्य किया।
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क्या वैश्वीकरण ने भारतीय संयुक्त परिवार तोड़ दिया?
बड़े नगरों में सह-निवास कमजोर हुआ, किंतु नातेदारी, जाति विवाह और त्योहार कर्तव्य मजबूत हैं और अक्सर वीडियो कॉल व वैवाहिक पोर्टल जैसे वैश्विक औजार प्रयोग करते हैं।
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क्या प्रभाव केवल सांस्कृतिक पश्चिमीकरण है?
नहीं। यह श्रम बाजार, विप्रेषण, असमानता और द्विदिश प्रवाह भी है जिसमें भारतीय फिल्म, योग और आईटी सेवाएँ बाहर जाती हैं तथा ब्रांड भीतर आते हैं।
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