Revision summary
संवैधानिक समानता और पंचायत आरक्षण ने स्त्रियों की सार्वजनिक कानूनी प्रस्थिति बदली। 2005–2019 के उत्तराधिकार, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल उत्पीड़न और तीन तलाक क़ानून अधिकार बढ़ाते हैं। स्कूलिंग और मातृ उत्तरजीविता सुधरे; 2023 महिला आरक्षण अभी परिसीमन की प्रतीक्षा में है। श्रम-बल भागीदारी और सुरक्षा कानूनी कथा से पीछे हैं। बदलाव वास्तविक, जाति-वर्ग स्तरित, भूमि और सार्वजनिक स्थान पर अधूरा है।
Model answer
Introduction
भारत में स्त्रियों की प्रस्थिति स्वतंत्रता के समय प्रथागत और आश्रित स्थिति से संवैधानिक समानता, विस्तारित क़ानून और दृश्य पद की ओर बढ़ी है। मूल्यांकन उन लाभों को श्रम-बल निकासी, हिंसा, तथा अधूरी संपत्ति और राजनीतिक हिस्सेदारी के विरुद्ध तौलना है।
Body
विधि और सार्वजनिक पद
- अनुच्छेद 14, 15, 16, 39 और 51क(ङ), 73वें और 74वें संशोधन के साथ, समानता तथा पंचायत-नगर निकाय में एक-तिहाई आरक्षण कानूनी फर्श बने; कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में पचास प्रतिशत तक प्रयोग किए।
- हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 ने पुत्रियों को सहदायिक अधिकार दिए; घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005, कार्यस्थल यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013, और 2019 में तत्काल तीन तलाक का आपराधिकरण 1950 के दशक के व्यक्तिगत विधि सुधार से आगे क़ानून बढ़ाते हैं।
- संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम 2023 लोक सभा और विधानसभा सीटों का एक-तिहाई स्त्रियों के लिए आरक्षित करता है, किंतु प्रारंभ परिसीमन की प्रतीक्षा में है, इसलिए राष्ट्रीय विधायी प्रस्थिति वादा है, वर्तमान नहीं।
- साक्षरता, स्कूल नामांकन और मातृ मृत्यु दर उत्तरोत्तर प्रजनन और शिक्षा मिशनों, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (2015) और संस्थागत प्रसव योजनाओं के अधीन सुधरे, जो जीवित रहना और शिक्षा में वास्तविक प्रस्थिति बदलाव है।
कार्य, गरिमा और अधूरा बदलाव
- महिला श्रम-बल भागीदारी अंतरराष्ट्रीय तुलना में कम है और नगरीय भारत में चिपकी रही है; एनआरएलएम के एसएचजी और मनरेगा महिला व्यक्ति-दिवस ग्रामीण एजेंसी दिखाते हैं जिसे संगठित निजी क्षेत्र अभी कम नियोजित करता है।
- गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 तथा गिरता किंतु अभी तिरछा बाल लिंगानुपात दिखाते हैं कि शिक्षा बढ़ने पर भी तकनीक और पुत्र-वरीयता बालिका को कम आँकती है।
- एनसीआरबी में दर्ज अपराध — क्रूरता, हमला, तस्करी — 2012 निरभया और दंड विधि संशोधनों के बाद दृश्यता में बढ़े; दृश्यता सुरक्षा के समान नहीं, विशेषकर दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक स्त्रियों के लिए।
- मूल्यांकन: कानूनी और राजनीतिक प्रस्थिति घरेलू, भूमि और कारखाने में रोजमर्रा सौदेबाजी शक्ति से अधिक बदली; बदलाव वास्तविक है, वर्ग-जाति से स्तरित है, और संपत्ति नियंत्रण तथा सुरक्षित सार्वजनिक स्थान के बिना अधूरा है।
Flow diagram
flowchart TD C[संविधान 73वाँ 74वाँ] --> G[कानूनी राजनीतिक प्रस्थिति] L[उत्तराधिकार 2005 घरेलू हिंसा कार्यस्थल 2013] --> G E[शिक्षा मातृ मृत्यु योजनाएँ] --> G W[कम श्रम भागीदारी हिंसा भूमि अंतर] --> D[अधूरी रोजमर्रा प्रस्थिति] G[G] --> D[D]
Conclusion
भारत में स्त्रियाँ विधि में केवल आश्रित नहीं रहीं: वे सहदायिक, सरपंच, और वादे में विधायक हैं। प्रस्थिति वहाँ पिछड़ती है जहाँ कार्य, सुरक्षा और भूमि पुरुष-कोडेड रहें, इसलिए मूल्यांकन पर्याप्त औपचारिक बदलाव है जिद्दी अनौपचारिक घाटे के साथ।
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क्या पंचायत आरक्षण ने प्रस्थिति बदली या केवल उपस्थिति?
दोनों। कई स्त्रियाँ प्रॉक्सी बैठती हैं, फिर भी अध्ययन दूसरी अवधि की सरपंच दिखाते हैं जो निधि नियंत्रित करती हैं और ग्राम सभा में बोलती हैं। उपस्थिति पहला प्रस्थिति बदलाव है; आवाज़ असमान है।
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क्या व्यक्तिगत विधि अब पूर्णतः समान है?
नहीं। हिंदू सहदायिकता 2005 में सुधरी; मुस्लिम, ईसाई और प्रथागत जनजातीय नियम अभी भिन्न हैं। तीन तलाक का आपराधिकरण समान नागरिक संहिता नहीं है।
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