Q13 · UPPSC Prelims 2024 · Set A · General Studies

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जस्टिस पार्टी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:1.जस्टिस पार्टी ने कांग्रेस का विरोध उसे एक ब्राहमण प्रभुत्व वाला संगठन कह कर किया।2.इसने गैर-ब्राह्मणों के लिये वैसे ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का दावा किया जैसा कि मार्ले-मिंटो सुधार ने मुसलमानों को दिया था।उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही हेह?नीचे दिए गएकूट से सही उत्तर चुनिए।

A 1 और 2 दोनों
B न तो 1 न ही 2
C केवल 1
D केवल 2

Correct answer: (a) 1 और 2 दोनों

व्याख्या

  1. A

    1 और 2 दोनों

    1 और 2 दोनों। कथन 1 सही है क्योंकि जस्टिस पार्टी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विरोध इसे एक ब्राह्मण-प्रधान संगठन बताकर किया था जो मद्रास प्रेसीडेंसी की निचली जातियों और गैर-ब्राह्मणों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। कथन 2 भी सही है क्योंकि पार्टी ने गैर-ब्राह्मणों के लिए अलग सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग की थी, जिसकी तुलना उसने 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों द्वारा मुसलमानों को दिए गए प्रतिनिधित्व से की थी। चूँकि दोनों कथन जस्टिस पार्टी के ऐतिहासिक दृष्टिकोण और राजनीतिक रुख की सटीक व्याख्या करते हैं, इसलिए यह विकल्प सही और व्यापक कुंजी है।

  2. B

    न तो 1 न ही 2

    न तो 1 न ही 2। यह विकल्प दावा करता है कि जस्टिस पार्टी के संबंध में दोनों कथन तथ्यात्मक रूप से गलत हैं। हालाँकि, यह असत्य है क्योंकि पार्टी ने कांग्रेस का विरोध भी किया था और अलग प्रतिनिधित्व की मांग भी उठाई थी।

  3. C

    केवल 1

    केवल 1। यह विकल्प दावा करता है कि कांग्रेस को ब्राह्मण-प्रधान संगठन बताने वाला पहला कथन सही है जबकि दूसरा गलत है। यह गलत है क्योंकि पार्टी ने गैर-ब्राह्मणों के लिए अलग सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग भी उतनी ही प्रमुखता से उठाई थी।

  4. D

    केवल 2

    केवल 2। यह विकल्प दावा करता है कि केवल सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग वाला कथन सही है जबकि कांग्रेस का विरोध असत्य है। यह गलत है क्योंकि जस्टिस पार्टी की स्थापना का मूल आधार ही कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देना था।

Summary. आधिकारिक कुंजी (a) है क्योंकि जस्टिस पार्टी के संदर्भ में दिए गए दोनों कथन ऐतिहासिक रूप से सत्य हैं। इस पार्टी का उदय मद्रास प्रेसीडेंसी में गैर-ब्राह्मणों के हितों की रक्षा के लिए हुआ था और इसने कांग्रेस की ब्राह्मणवादी प्रकृति की तीखी आलोचना की थी। इसके अतिरिक्त, इसने मार्ले-मिंटो सुधारों की तर्ज पर गैर-ब्राह्मणों के लिए पृथक सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग की थी। विकल्प (a) इन दोनों तथ्यों को सही मानता है, इसलिए यह सही उत्तर है।