Q1 · UPPSC 2024 · UPHIN · 30 marks · Solution निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।सही प्रकार का समाजीकरण होने पर समाज के सदस्य सामाजिक नियमों के अनुरूप व्यवहार करते हैं। यदि गलत समाजीकरण हो जाता है तो विपथगामी व्यवहार में वृद्धि होती है। इसलिए समाजीकरण के दायित्व से संबंधित जो व्यक्ति होते हैं उन पर सामाजिक नियंत्रण का बहुत बड़ा दायित्व होता है। बॉटोमोर के अनुसार शिक्षा बच्चे के प्रारम्भिक समाजीकरण का सबसे दृढ़ आधार है। शैक्षिक व्यवस्था नैतिक विचारों को स्पष्ट करके और व्यक्ति का बौद्धिक विकास करके सामाजिक नियमन में योगदान देती है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को विभिन्न इकाइयों से परिचित करवाना है। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक महत्त्व ही नहीं, अपितु उसकी व्यावहारिक उपयोगिता भी है। सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधन जहाँ व्यक्ति को सामाजिक नियमों को मानने के लिए बाध्य करते हैं, वहीं शिक्षा उसे आत्म-विश्लेषण द्वारा सामाजिक नियमों का पालन करने की प्रेरणा देती है। शिक्षा व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण सिखाती है और व्यक्ति के स्तर पर नियंत्रण से सामाजिक नियंत्रण स्वतः बना रहता है।(a) उपरिलिखित गद्यांश का आशय अपने शब्दों में लिखिए। (5 marks)(b) समाजीकरण के लिए सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधनों से शिक्षा क्यों भिन्न है? (5 marks)(c) गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q2 · UPPSC 2024 · UPHIN · 30 marks · Solution उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए।सहयोग से ही जीवन है, स्पर्धा तो अन्ततः विनाश और मृत्यु की ओर ले जाती है। हम अपने साथ अन्य को भी ले, यदि वह पिछड़ जाता है तो उसकी मदद करें। यदि हम सभी परस्पर यह भाव अपनाते हैं तो हम एक-दूसरे के संकट में साथी बनकर एक दूसरे को बचाएंगे और विकास के मार्ग पर एक-दूसरे को प्रोत्साहित करेंगे। सहयोग की इस प्रक्रिया में ही जीवन सुरक्षित है। यदि हम अपना ही स्वार्थ सामने रखकर अन्य की टाँग खींचते हुए स्वयं को ही आगे बढ़ाएँगे तो यह स्पर्धा होगी और यह स्पर्धा एक-दूसरे को खिलाफ करते हुए आपस में लड़ने-भिड़ने और अन्ततः एक-दूसरे का विनाश करने का कारण बनेगी। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध अपने-अपने साम्राज्य, उपनिवेश तथा व्यापार को बढ़ाने के संघर्ष का परिणाम थे जिसमें व्यापक नरसंहार हुआ। वस्तुतः स्पर्धा मानव संस्कृति के लिए विनाश का मार्ग है। व्यक्तियों एवं राष्ट्रों के बीच आपसी सहयोग से ही मानव संस्कृति सुरक्षित है।(a) गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। (5 marks)(b) स्पर्धा और सहयोग में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (5 marks)(c) गद्यांश का संक्षेपण (लगभग एक-तिहाई शब्दों में) कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q1 · UPPSC 2021 · UPHIN · 30 marks · Solution निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।किसी परिमित वर्ग के कल्याण से सम्बन्ध रखने वाले धर्म की अपेक्षा विस्तृत जनसमूह के कल्याण से सम्बन्ध रखने वाला धर्म उच्च कोटि का है। धर्म की उच्चता उसके लक्ष्य के व्यापकत्व के अनुसार समझी जाती है। गृहधर्म या कुलधर्म से समाज श्रेष्ठ है, समाज-धर्म से लोकधर्म, लोकधर्म से विश्वधर्म, जिसमें धर्म अपने शुद्ध और पूर्ण स्वरूप में दिखाई पड़ता है। यह पूर्ण धर्म अंगी है और शेष धर्म अंग। पूर्ण धर्म, जिसका सम्बन्ध अखिल विश्व की स्थिति-रक्षा से है, वस्तुतः पूर्ण पुरुष या पुरुषोत्तम में ही रहता है, जिसकी मार्मिक अनुभूति सच्चे भक्तों को हुआ करती है; इसी अनुभूति के अनुरूप उनके आचरण का भी उत्तरोत्तर विकास हो जाता है। गृहधर्म पर दृष्टि रखने वाला लोक या समस्त या किसी परिवार की रक्षा देखकर, वर्गधर्म पर दृष्टि रखने वाला किसी वर्ग या समाज की रक्षा देखकर और लोकधर्म पर दृष्टि रखने वाला लोक या समस्त मनुष्य-जाति की रक्षा देखकर आनंद का अनुभव करता है। पूर्ण या शुद्ध धर्म का स्वरूप सच्चे भक्त ही अपने और दूसरों के सामने लाया करते हैं, जिनके भगवान पूर्ण धर्म स्वरूप हैं; अतः ये कीट-पतंग से लेकर मनुष्य तक सब प्राणियों की रक्षा देखकर आनंद प्राप्त करते हैं। विषय की व्यापकता के अनुसार उनका आनंद भी उच्च कोटि का होता है। उच्च से उच्च भूमि के धर्म का आचरण अत्यन्त साधारण कोटि का हो सकता है। इसी प्रकार निम्न भूमि के धर्म का आचरण उच्च से उच्च कोटि का हो सकता है। गरीबों का गला काटने वाले चींटियों के बिलों पर आटा फैलाते देखे जाते हैं; अकाल-पीड़ितों की सहायता में एक पैसा चन्दा न देने वाले अपने डूबते मित्र को बचाने के लिए प्राण-संकट में पड़ते देखे जाते हैं।(क) प्रस्तुत गद्यांश का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। (5 marks)(ख) धर्म समाज का कल्याण कैसे करता है? इसे गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (5 marks)(ग) उपर्युक्त गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q2 · UPPSC 2021 · UPHIN · 30 marks · Solution निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर निर्देशानुसार उत्तर दीजिए।लोभियों का दमन योगियों के दमन से किसी प्रकार कम नहीं होता। लोभ के बल से वे काम और क्रोध को जीतते हैं, सुख की वासना का त्याग करते हैं, मान-अपमान में समान भाव रखते हैं। अब और चाहिए क्या? जिससे वे कुछ पाने की आशा रखते हैं वह यदि उन्हें दस गालियाँ भी देता है तो उनकी आकृति पर न रोष का कोई चिह्न प्रकट होता है और न मन में ग्लानि होती है। न उन्हें मक्खी चूसने में घृणा होती है और न रक्त चूसने में दया। सुन्दर से सुन्दर रूप देखकर वे अपनी एक कौड़ी भी नहीं भूलते। करुण से करुण स्वर सुनकर वे अपना एक पैसा भी किसी के यहाँ नहीं छोड़ते। तुच्छ से तुच्छ व्यक्ति के सामने हाथ फैलाने में वे लज्जित नहीं होते। क्रोध, दया, घृणा, लज्जा आदि करने से क्या मिलता है कि वे करने जायें? जिस बात से उन्हें कुछ मिलता नहीं, उसके लिए उनके मन के किसी कोने में जगह नहीं होती; तब जिस बात से पास का कुछ जाता है, वह बात उन्हें कैसी लगती होगी, यह यों ही समझा जा सकता है। जिस बात में कुछ लगे वह उनके काम की नहीं, चाहे वह कष्ट निवारण हो या सुख-प्राप्ति, धर्म हो या न्याय। वे शरीर सुखाते हैं, अच्छे भोजन, अच्छे वस्त्र आदि की आकांक्षा नहीं करते। लोभ के अंकुश से अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में रखते हैं। लोभियों! तुम्हारा अक्रोध, तुम्हारा इन्द्रिय-निग्रह, तुम्हारा मानापमान-समता, तुम्हारा तप अनुकरणीय है। तुम्हारी निष्ठुरता, तुम्हारी निर्लज्जता, तुम्हारा अविवेक, तुम्हारा अन्याय विगर्हणीय है। तुम धन्य हो! तुम्हें धिक्कार है!!(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उचित शीर्षक दीजिए। (5 marks)(ख) उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर लोभियों के लक्षण बताइए। (5 marks)(ग) उपर्युक्त गद्यांश का संक्षेपण कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q1 · UPPSC 2020 · UPHIN · 30 marks · Solution भारत, प्रकृति की संसार में सबसे बड़ी लीला भूमि है। यहाँ सभी ऋतुएँ—किसी न किसी भाग में एक साथ मौजूद रहती हैं। नदी, पर्वत, वन और अन्नपूर्णा धरती से, भारतीय साहित्य का सदा से गहरा संबंध रहा है। क्योंकि उसने प्रकृति से अपनी सहधर्मिता और सहअस्तित्व को पहचाना है। भारत की पहली कविता ही पशु-पक्षी की हिंसा के विरुद्ध जन्मी थी। कवियों ने प्रकृति की हल्की से हल्की धड़कन और कंपन को महसूस किया है। आदिकवि वाल्मीकि जानते हैं कि कड़कड़ाती ठंड में जलचर हंस कैसे संभल कर, डरकर ठंडे पानी में पैर डालते हैं? कालिदास को पता है कि अनुकूल मंद-मंद पवन यात्रा का शुभ शकुन है। प्रेमचंद के बैल अपनी व्यथा-कथा हमारे कान में कह जाते हैं। प्रसाद की प्रकृति हमें अतिवाद के प्रति सावधान करती है। रचनाकार तो मनुष्य की संवेदना का प्रतीक भी है और प्रहरी भी। प्रकृति से उसका साहचर्य और संवाद मनुष्य से प्रकृति के संवाद और साहचर्य का प्रतीक है। इस तरह अंतः प्रकृति और वाह्यप्रकृति के सहारे निरंतर परिष्कृत, सरल और प्रांजल बनती है। आज प्रकृति के प्रति हिंस्र और विसंवादी होकर हमने क्या पाया है—तरह-तरह के शारीरिक, मानसिक रोग, एक संकीर्ण और विकृत अंतःकरण, एक संवेदनहीन आत्मकेंद्रित जगत और चारों तरफ प्रदूषण का तांडव—जो अंततः हमारा विनाश ही करेगा। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि पहाड़ और समुद्र को देखने भर से मनुष्य का हृदय विशाल होता है—तो यदि वे हमारे मन में ही बस जाएँ, तो हम कितने विराट और उदात्त हो सकेंगे? यह जान लेना जरूरी है कि प्रकृति मनुष्य का प्रतिपक्ष नहीं है, वह उसकी सहचरी है। जो रहस्य खोजे गए हैं वे खोजने के लिए ही उसने बचाए हैं, ताकि मनुष्य का कृतित्व अकारण न हो, उसका पौरुष हीनताबोध में न बदल जाए।(क) प्रस्तुत गद्यांश का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। (10 marks)(ख) मनुष्य और प्रकृति के आपसी रिश्ते को गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (10 marks)(ग) उपर्युक्त गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। (10 marks) Open solution →
Q2 · UPPSC 2020 · UPHIN · 30 marks · Solution विद्वानों का मानना है कि राजनीति ने भाषा को भ्रष्ट कर दिया है; शब्दों से उनके सही अर्थ छीनकर उन्हें छद्म अर्थ पहना दिए हैं। संसद, संविधान, कानून, जनहित, न्याय, अधिकार, साक्ष्य, जाँच जैसे ढेरों शब्द अपना असली अर्थ खोकर बदशक्ल हो चुके हैं। शब्द भले ही अच्छा या बुरा कोई भी अर्थ प्रकट करता हो, जब अपना असली अर्थ खो देता है, तो वह बदशक्ल हो जाता है। भाषा का भ्रंश, अंततः सामाजिक मानवीय मूल्यों का भ्रंश है। कल्पना कीजिए कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से जो कहे उसका वही अर्थ ना हो, जो भाषा प्रकट करती है या ऐसे अनुभवों की पुनरावृत्ति के कारण दूसरा व्यक्ति उसे सही अर्थ में ना लेकर उसमें अनर्थ या अन्य अर्थ खोजने लगे तो क्या होगा? यह मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठने का मामला है, जो सामाजिक विश्रृंखलता का पहला और अंतिम चरण है। पहला इसलिए कि भाषा को मनुष्य ने परस्पर संवाद और सही संप्रेषण के लिए गढ़ा है और अंतिम इसलिए कि आगे चलकर मनुष्य का कर्म भी भाषा के मूल अर्थ का नहीं उसके भ्रंश का रूप ले लेता है। यह इस तरह होता है कि छद्म अर्थ का वाहन करते-करते भाषा अंततः हमारे कर्म को ही छद्म में बदल देती है। क्या हम भाषा को भ्रष्ट करने की परिणति राजनीतिक और सामाजिक जीवन के चरम पतन में नहीं देख रहे?(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उचित शीर्षक दीजिए। (5 marks)(ख) उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर भाषा की भूमिका पर प्रकाश डालिए। (5 marks)(ग) उपर्युक्त गद्यांश का संक्षेपण कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q1 · UPPSC 2019 · UPHIN · 30 marks · Solution निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।जिस प्रकार साहित्य, धर्म और विज्ञान का लोक के व्यापक जीवन में प्रवेश आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन के संस्कार और समाज की स्थिति के लिए कला की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि कला कुछ सौन्दर्य-प्रेमियों के लिए विलास या कुतूहल वृत्ति का साधन मात्र रहेगी, तो लोक की बड़ी हानि होगी। वस्तुतः कला जीवन के सूक्ष्म और सुन्दर पट का वितान है, जिसके आश्रय में समग्र लोक अपनी उत्सवानुगामी और संस्कारक प्रवृत्तियों को तृप्त करता हुआ, उच्च मन की शान्ति और समन्वय का अनुभव कर सकता है। मनुष्य अपने अन्तिम कल्याण के लिए यह चाहता है कि जितना स्थूल जड़ जगत् उसके चारों ओर घिरा हुआ है, उसको सुन्दर रूप में ढाल ले। स्थूल के ऊपर जो मानस और अध्यात्म जगत है उसको चरित्र और ज्ञान के द्वारा अत्यंत आकर्षक और सौन्दर्य युक्त बनाते हैं। इस द्विविध सौन्दर्य के बीच में ही जीवन पूरी तरह से रहने योग्य बनता है। जिस समय जीवन के चरित्र और मनोभाव हमारे चारों ओर विकसित होकर अपनी लहरियों से वातावरण को भर देते हैं और उनकी तरंगें हमारे अंतर्जगत को आह्लादित और प्रेरित करती हैं, उस समय यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि स्थूल पार्थिव वस्तुओं के जो अनगढ़ रूप हमें घेरे हुए हैं, वे भी कला के प्रभाव से द्रवित हो जाएँ और उनमें से रूप-सौन्दर्य और श्री के सोते फूट निकलें। कला का प्रत्येक उदाहरण जगमगाते दीपक की तरह अपने चारों ओर प्रकाश की किरणें भेजता रहता है।(क) प्रस्तुत गद्यांश का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। (5 marks)(ख) जीवन किस स्थिति में रहने योग्य बनता है? गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (5 marks)(ग) उपर्युक्त गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q2 · UPPSC 2019 · UPHIN · 30 marks · Solution निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर निर्देशानुसार उत्तर लिखिए।जीवन को उसकी समग्रता में सोचना और जीवन को एक खास इरादे से सोचना दो अलग तरह की तैयारियाँ हैं और इस माने में साहित्य जब भी राजनीति की तरह भाषा का एक तरफा या इकहरा प्रयोग करता है, वह अपनी मूल शक्ति को सीमित या कुंठित करता है। राजनीति के मुहावरे में बोलते समय हम एक ऐसे वर्ग की भाषा बोल रहे होते हैं जिसके लिए भाषा प्रमुख चीज नहीं है, वह भाषा का दूसरे या तीसरे दर्जे का इस्तेमाल है। वह एक खास मकसद तक पहुँचने का साधनमात्र है। उसे भाषा की सामर्थ्य, प्रामाणिकता या सचाई में उस तरह दिलचस्पी नहीं रहती जिस तरह साहित्य को। उसकी भाषा प्रचार-प्रमुख, रेटारिकल और नकली व्यक्तित्व की भाषा हो सकती है क्योंकि राजनीति के लिए भाषा एक व्यावहारिक और कामचलाऊ चीज़ है जब कि साहित्यकार के लिए भाषा उस ज़िन्दगी की सचाई का जीता जागता हिस्सा है जिसे वह राजनीतिक, व्यावसायिक, व्यावहारिक या स्वार्थों की हिंसा, तोड़-फोड़ और प्रदूषण से बचाकर उसकी मूल गरिमा और शक्ति में स्थापित या पुनर्स्थापित करना चाहता है। साहित्य का काम अपनी पहचान को राजनीति की भाषा में खो देना नहीं, बल्कि उस भाषा के छद्म से अपने को लगभग बेगाना करके अकेला कर लेना है, एक सत्त की तरह अकेला, कि राजनीति के लिए जरूरी हो जाए कि वह बार बार अपनी प्रामाणिकता और सचाई के लिए साहित्य से भाषा माँगे न कि साहित्य ही राजनीति की भाषा बनकर अपनी पहचान खो दे।(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उचित शीर्षक दीजिए। (5 marks)(ख) साहित्य की और राजनीति की भाषा में प्रमुख अंतर क्या है? स्पष्ट कीजिए। (5 marks)(ग) उपर्युक्त गद्यांश का संक्षेपण कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q1 · UPPSC 2018 · UPHIN · 30 marks · Solution निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है। मैं अनुभव करता हूँ कि हम लोग एक कठिन समय के भीतर से गुजर रहे हैं। आज नाना भाँति के संकीर्ण स्वार्थों ने मनुष्य को कुछ ऐसा अंधा बना दिया है कि जाति-धर्म-निर्विशेष मनुष्य के हित की बात सोचना असंभव हो गया। ऐसा लग रहा है कि किसी विकट दुर्भाग्य के इंगित पर दलगत स्वार्थ-प्रेम ने मनुष्यता को दबोच लिया है। दुनिया छोटे-छोटे संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर अनेक दलों में विभक्त हो गई है। अपने दल के बाहर का आदमी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उसके रोने-गाने तक पर असदुद्देश्य का आरोप किया जाता है। उसके तप और सत्यनिष्ठा का मजाक उड़ाया जाता है।(क) प्रस्तुत गद्यांश का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। (5 marks)(ख) साहित्य के लक्ष्य के विषय में उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर विचार कीजिए। (5 marks)(ग) प्रस्तुत गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। (20 marks) Open solution →
Q2 · UPPSC 2018 · UPHIN · 30 marks · Solution निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर निर्देशानुसार उत्तर लिखिए।परिवर्तन से हम बच नहीं सकते। परिवर्तन से बचना अगति और दुर्गति को आमंत्रित करना है। यद्यपि स्थिरता में किसी अंश में सुरक्षा है, तथापि बिना जोखिम लिए आगे नहीं बढ़ा जाता है। नियमों की स्थिरता जो विज्ञान में है और स्फूर्तिमय जीवन की गतिशीलता जो साहित्य में है, दोनों के बीच का हमें संतुलित मार्ग खोजना है। जीवन के संतुलनों में नए और पुराने का संतुलन भी विशेष महत्व रखता है। संसार की गतिशीलता के साथ हमको भी गतिशील होना पड़ेगा, किंतु आँखें खोलकर। नवीन के लिए हम अपने मनमंदिर का द्वार सदा खुला रखें, पूर्वाग्रहों से काम न लें। उसके पक्ष और विपक्ष की युक्तियों को न्याय की तुला पर तौलें। एक सीमा के भीतर नए प्रयोगों को भी अपने में स्थान दें, किंतु केवल नवीनता के प्रमाण-पत्र मात्र से संतुष्ट न हो जाएं। जिस तर्कबुद्धि को हम प्राचीन प्रथाओं के उन्मूलन में लगाते हैं उसी निर्मम तर्क को नवीन के परीक्षण में भी लगावें किंतु नवीन को भूत की भाँति भय का कारण न बनावें।(क) प्रस्तुत गद्यांश को उचित शीर्षक दीजिए। (5 marks)(ख) प्राचीन और नवीन में संतुलन क्यों आवश्यक है? विचार कीजिए। (5 marks)(ग) प्रस्तुत गद्यांश का संक्षेपण कीजिए। (20 marks) Open solution →