Revision summary
उ.प्र. तराई अभयारण्य दुधवा टीआर (किशनपुर, कतरनियाघाट), पिलीभीत, सुहेलवा और सोहागीबरवा हैं। वे नेपाल किनारे दुर्लभ साल-घास-बाढ़ मैदान मोज़ेक बचाते हैं। प्राणिजात में बाघ, हाथी, बारहसिंगा, गैंडा प्रयास और घास विशेषज्ञ हैं। नदियाँ कतरनियाघाट पर डॉल्फिन व घड़ियाल मूल्य जोड़ती हैं। महत्व प्रक्रिया है: बाढ़, घास, गलियारा और रिचार्ज, केवल पर्यटन नहीं।
Model answer
Introduction
उत्तर प्रदेश के तराई अभयारण्य — बाघ-रिजर्व कोर के रूप में दुधवा के साथ किशनपुर व कतरनियाघाट, पिलीभीत वन, सुहेलवा, सोहागीबरवा और संबद्ध आर्द्रभूमि — भारत-नेपाल किनारे अंतिम बड़ा साल-घास-बाढ़ मैदान मोज़ेक हैं। पारिस्थितिक महत्व बाघ व हाथी स्थान, दलदली हिरण व घास पक्षी, नदी गलियारे और रिचार्ज है। वे पर्यटक पोस्टर पर सजावटी पार्क नहीं।
Body
तराई समूह
- दुधवा राष्ट्रीय उद्यान साथ किशनपुर और कतरनियाघाट वन्यजीव अभयारण्य दुधवा टाइगर रिजर्व बनाते हैं, राज्य का ध्वज तराई खंड।
- पिलीभीत टाइगर रिजर्व साल-घास पट्टी को पश्चिम जारी रखता है; सुहेलवा (बलरामपुर-श्रावस्ती) और सोहागीबरवा (महराजगंज) पूर्वी तराई-भाबर वन रखते हैं।
- बाढ़ मैदान आर्द्रभूमि और नदी खंड (घाघरा, शारदा, मोहाना, सुहेली) उसी पारिस्थितिकी का भाग हैं भले अलग अधिसूचित हों।
मोज़ेक क्यों मायने रखता है
- तराई-दुआर सवाना और घासस्थल वैश्विक दुर्लभ पारिस्थितिक क्षेत्र है: बाढ़-नाड़ी पर ऊँची घास, दलदल और साल। खेत के लिए सुखाओ तो बारहसिंगा घास के साथ जाता है।
- दुधवा में दलदली हिरण (बारहसिंगा), बाघ, हाथी, गैंडा पुनर्परिचय, हिस्पिड हेयर, हॉग डियर और बंगाल फ्लोरिकन पट्टी को अनोखा मैदानी प्राणिजात बनाते हैं, पहाड़ का बचा टुकड़ा नहीं।
- नेपाल के बर्दिया और शुक्लाफांटा की ओर पार-सीमा गलियारे जीन चलाते रखते हैं; बिना गलियारा बाड़ अभयारण्य द्वीप है जो अंतःप्रजनन करेगा।
करिश्माई से परे सेवाएँ
- तराई पंखे पर बाढ़ क्षीणन, भूजल रिचार्ज और अवसाद पकड़ उस गन्ना-धान पट्टी की रक्षा करते हैं जो वन से सट गई।
- साल व घास में कार्बन, और थारू व अन्य वन-किनारा समुदायों की गैर-काष्ठ आजीविका, पारिस्थितिक-आर्थिक सेवाएँ हैं यदि अधिकार व चराई प्रबंधित हों, केवल नाम पर नकारे नहीं।
- घाघरा-गेरुआ (कतरनियाघाट) पर नदी डॉल्फिन व घड़ियाल खंड महत्व वन से जलीय तक बढ़ाते हैं।
महत्व तय करने वाले संकट
- अतिक्रमण, घास तक गन्ना, रेल व राष्ट्रीय राजमार्ग मृत्यु और आक्रामक प्रजातियाँ वह मोज़ेक सिकोड़ते हैं जिसे अभयारण्य रखने को हैं।
- पारिस्थितिक महत्व इसलिए प्रक्रिया का संरक्षण है — बाढ़, घास में आग, गलियारा — केवल बाघ फोटो नहीं।
Flow diagram
flowchart TD T[तराई अभयारण्य] --> D[दुधवा किशनपुर कतरनियाघाट] T --> P[पिलीभीत सुहेलवा सोहागीबरवा] D --> M[साल घास बाढ़ नाड़ी] P --> M M --> F[बाघ बारहसिंगा गलियारा रिचार्ज]
Conclusion
उ.प्र. में तराई वन्यजीव अभयारण्य दुधवा-कतरनियाघाट-किशनपुर, पिलीभीत, सुहेलवा और सोहागीबरवा के साल-घास-बाढ़ मैदान इंजन के रूप में मायने रखते हैं। वे बाघ, हाथी, बारहसिंगा और नदी प्राणि रखते हैं, पंखा रिचार्ज करते हैं, नेपाल गलियारा थामते हैं। घास और बाढ़ नाड़ी खोओ तो अभयारण्य केवल साल काष्ठ वनखंड है।
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क्या दुधवा अभयारण्य है या राष्ट्रीय उद्यान?
दुधवा स्वयं राष्ट्रीय उद्यान है। किशनपुर और कतरनियाघाट वन्यजीव अभयारण्य हैं; साथ वे टाइगर रिजर्व बनाते हैं जो तराई कोर है।
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घासस्थल साल जितना क्यों महत्वपूर्ण?
क्योंकि बारहसिंगा, फ्लोरिकन और हॉग डियर घास प्रजाति हैं। अकेला साल इमारती कथा है; मोज़ेक पारिस्थितिकी है।
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