Revision summary
अनुच्छेद 165 राज्यपाल को उत्तर प्रदेश के लिए उच्च न्यायालय-योग्य महाधिवक्ता नियुक्त करने देता है। मंत्री चुनाव सलाह देते हैं; अवधि प्रसादपर्यंत है, निश्चित कार्यकाल नहीं। कार्य सलाह, न्यायालय उपस्थिति और विधानमंडल में बिना मत की आवाज हैं। प्रयागराज और लखनऊ खंडपीठ पद को बड़ा और सरकार के निकट बनाते हैं। आलोचनात्मक अंतर स्वतंत्रता है जब राज्य स्वयं वादी हो।
Model answer
Introduction
उत्तर प्रदेश का महाधिवक्ता अनुच्छेद 165 के अधीन राज्य का सर्वोच्च विधि अधिकारी है। आलोचनात्मक परीक्षण राज्यपाल की औपचारिक नियुक्ति, उच्च न्यायालय योग्यता और प्रसाद-अवधि को लखनऊ सलाह तथा प्रयागराज-लखनऊ पैरवी के वास्तविक काम से तौलना चाहिए।
Body
नियुक्ति
- अनुच्छेद 165(1) कहता है कि राज्यपाल ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करेंगे जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने योग्य हो; उत्तर प्रदेश में इसका अर्थ इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार या समकक्ष न्यायिक स्तर है, कोई अलग राज्य क़ानून नहीं।
- व्यवहार में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर चलते हैं, इसलिए पद लखनऊ सरकार के साथ घूमता है, कॉलेजियम या सार्वजनिक विज्ञापन से नहीं।
- पदावधि अनुच्छेद 165(3) के अधीन राज्यपाल के प्रसादपर्यंत है; निश्चित अवधि नहीं, महाभियोग नहीं, सरकार बदलते ही हटाया जा सकता है।
- पारिश्रमिक राज्यपाल निर्धारित करते हैं; अतिरिक्त और उप महाधिवक्ता राज्य इसलिए बनाता है कि उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ प्रयागराज और लखनऊ खंडपीठ दोनों ढकें।
कार्य
- महाधिवक्ता उत्तर प्रदेश सरकार को उन विधिक प्रश्नों पर सलाह देते हैं जो राज्यपाल भेजें या, दैनिक काम में, विधि विभाग और सचिवालय के विभाग भेजें।
- उन्हें राज्य के सभी न्यायालयों में पैरवी का अधिकार है और वे उच्च न्यायालय तथा निर्देश पर उच्चतम न्यायालय में उत्तर प्रदेश की ओर से उपस्थित होते हैं।
- अनुच्छेद 177 उन्हें विधान सभा और विधान परिषद में बोलने तथा समितियों में बैठने देता है, मत नहीं, इसलिए पद सदन में विधि अधिकारी है, विधायक नहीं।
- वे राज्यपाल द्वारा सौंपे गए अन्य विधिक कर्तव्य भी करते हैं, जिनमें अध्यादेश, भूमि-अर्जन और सेवा मुकदमे शामिल हैं जो यूपी डॉकेट पर हावी रहते हैं।
आलोचनात्मक बिंदु
- प्रसाद और राजनीतिक नियुक्ति मंत्रिमंडल को वफादार सलाहकार देती है; उच्च न्यायालय न्यायाधीश जैसी स्वतंत्रता नहीं देती, जबकि राज्य अपने न्यायालयों में सबसे बड़ा वादी है।
- फैला अतिरिक्त-महाधिवक्ता तंत्र एक संवैधानिक आवाज को पतला कर पद को प्रयागराज और लखनऊ सूचियों की ब्रीफिंग फैक्टरी बना सकता है।
- संविधान अभी भी उच्च न्यायालय स्तर माँगता है; वह तल, प्रसाद खंड नहीं, पूरी तरह दलीय नाम पर एकमात्र वास्तविक रोक है।
Flow diagram
flowchart TD G[राज्यपाल अनुच्छेद 165] --> AG[महाधिवक्ता यूपी] CM[मंत्रिपरिषद] --> G AG --> Adv[लखनऊ सलाह] AG --> HC[प्रयागराज लखनऊ खंडपीठ] AG --> H[अनुच्छेद 177 सदन] Pl[प्रसाद अवधि] --> AG
Conclusion
उत्तर प्रदेश में महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल मंत्रिमंडलीय सलाह पर करते हैं, पद प्रसादपर्यंत है, और कार्य राज्य को सलाह देना तथा प्रतिनिधित्व करना है। प्रक्रिया संवैधानिक रूप से वैध किंतु राजनीतिक रूप से नाजुक है; कार्य व्यापक हैं, स्वतंत्रता उच्च न्यायालय योग्यता से पतली है।
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क्या राज्यपाल महाधिवक्ता को निजी विवेक से नियुक्त करते हैं?
पाठ राज्यपाल का नाम लेता है; स्थापित व्यवहार मंत्रिपरिषद की सहायता-सलाह है, इसलिए लखनऊ कैबिनेट प्रभावी रूप से चुनती है।
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क्या महाधिवक्ता विधान सभा में मत दे सकते हैं?
नहीं। अनुच्छेद 177 आवाज देता है, मत नहीं।
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