Revision summary
2020 लॉकडाउन ने संपर्क गतिविधि और अनौपचारिक मजदूरी काटी और प्रवासियों को घर भेजा। 2020–21 में वास्तविक जीडीपी लगभग 7 प्रतिशत सिकुड़ा; कृषि अपेक्षाकृत लचीली रही। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण ने सबसे गरीब परिवारों के नीचे अनाज और नकद रखा। आत्मनिर्भर पैकेजों ने एमएसएमई गारंटी और बाद में पीएलआई प्रयोग किए, केवल अंतरण नहीं। बजट 2021–22 चक्र उठाने को स्वास्थ्य और सार्वजनिक पूँजी व्यय पर झुका।
Model answer
Introduction
मार्च 2020 लॉकडाउन ने वायरस धीमा करने को परिवहन, दुकानें और फैक्टरियाँ रोकीं। आर्थिक लागत माँग-और-पूर्ति एक साथ ढहना था: खोई मजदूरी, टूटा एमएसएमई नकद, और प्रवासी का घर पैदल। भारत का वास्तविक जीडीपी 2020–21 में लगभग 7 प्रतिशत सिकुड़ा, दुर्लभ शांतिकाल मंदी। बजटीय रणनीति ने राहत, ऋण गारंटी, और 2021–22 तक चक्र उठाने को सार्वजनिक निवेश धक्का मिलाया।
Body
लॉकडाउन का प्रभाव
- उत्पादन: 2020–21 में तेज संकुचन, संपर्क सेवाएँ, निर्माण और व्यापार कृषि से अधिक मारे गये, जिसने फर्श रखा।
- श्रम: अनौपचारिक और प्रवासी श्रमिकों ने दैनिक मजदूरी पहले खोई; शहरी बेरोजगारी और उल्टा पलायन मंदी का मानवीय चेहरा थे।
- फर्में: एमएसएमई ने बिना भुगतान बिल, किराया और बंद बाजार झेले; नकद वाली कुछ बड़ी फर्में टिकीं, उद्योग के भीतर असमानता चौड़ी की।
- माँग: परिवारों ने विवेकाधीन खर्च काटा; भय और खोई आय ने अनलॉक के बाद भी कीन्सीय अंतर बनाया।
- राजकोषीय और बाह्य: कर प्राप्तियाँ झुकीं जबकि स्वास्थ्य और भोजन बिल उठे; तेल कीमतों ने बाद में आयात बिल मदद की, पर वह भाग्य था, लॉकडाउन डिज़ाइन नहीं।
- मानव पूँजी: बंद स्कूल और छूटा पोषण बाद की उत्पादकता में दिखेंगे, केवल 2020 जीडीपी में नहीं।
मंदी प्रवृत्ति के विरुद्ध बजटीय रणनीति
- तत्काल प्रधानमंत्री गरीब कल्याण और संबंधी खिड़कियाँ: अतिरिक्त अनाज, महिलाओं के जन धन में नकद, गैस सिलेंडर और मजदूरी सहारा — उपभोग फर्श, प्रोत्साहन फैक्टरी नहीं।
- आत्मनिर्भर भारत पैकेज: एमएसएमई के लिए ऋण गारंटी, कर और अनुपालन राहत, क्षेत्र टॉप-अप, और बाद में पीएलआई ताकि केवल माँग-सहारे से आपूर्ति पुनरुद्धार की ओर खिसके।
- आरबीआई ने तरलता ढीली की; वह मौद्रिक है, पर बजट ने उस पर गिना ताकि राजकोष हर रुपये न ढोए।
- संघ बजट 2021–22 ने भाषा स्वास्थ्य (नयी स्वास्थ्य मिशन खिड़की सहित), सड़क, रेल और शहरी पर सार्वजनिक पूँजी व्यय, तथा निवेश चुकाने को निजीकरण-plus-संपत्ति-मौद्रीकरण बात पर बदली, केवल अंतरण छापने से नहीं।
- राज्यों, उत्तर प्रदेश सहित, ने पैटर्न नकल किया: भोजन और स्वास्थ्य plus फावड़ा-तैयार पूँजी कार्य।
- रणनीति तर्क: पहले भूख रोको, फिर ऋण खोलो, फिर सार्वजनिक पूँजी व्यय निजी निवेश भीड़ लाए जब निजी पशु-भाव मरे हों।
समीक्षा यह है कि भारत ने लक्षित-राहत-plus-बाद-पूँजी पथ चुना, विशाल सार्वभौमिक चेक नहीं। उसने फर्श और राजकोषीय कहानी बचाई; एमएसएमई मृत्यु और अधिगम हानि के दाग छोड़े।
Flow diagram
flowchart TD L[लॉकडाउन 2020] --> O[लगभग 7 प्रतिशत संकुचन] L --> M[प्रवासी एमएसएमई मजदूरी हानि] R[पीएमजीकेपी भोजन नकद] --> F[उपभोग फर्श] A[आत्मनिर्भर ऋण पीएलआई] --> V[पूर्ति पुनरुद्धार] B[बजट 2021-22 पूँजी स्वास्थ्य] --> V F --> V
Conclusion
लॉकडाउन ने मजदूरी, प्रवासी, एमएसएमई और संपर्क सेवाएँ मारीं; 2020–21 जीडीपी लगभग 7 प्रतिशत सिकुड़ा जबकि कृषि बेहतर टिकी। बजटीय रणनीति पीएमजीकेपी भोजन-और-नकद से आत्मनिर्भर ऋण गारंटी से 2021–22 पूँजी-और-स्वास्थ्य बजट तक चली। वह मिश्रण ने बिना कंबल हेलीकॉप्टर गिरावट मंदी माँग से लड़ा; गरिमापूर्ण नौकरियाँ और स्कूल पकड़ अधूरा प्रोत्साहन रहे।
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क्या बजट ने लॉकडाउन हानि रुपये-दर-रुपया बदली?
नहीं। भारत ने फर्श plus ऋण और बाद पूँजी प्रयोग की, खोई निजी माँग का पूर्ण ऑफसेट नहीं।
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क्या कृषि अप्रभावित थी?
संपर्क सेवाओं से बेहतर टिकी, पर मंडी, श्रम और नाशवान ने पहले सप्ताह अभी चोट ली।
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