Revision summary
हरित क्रांति ने एचवाईवी, उर्वरक, पंप और एमएसपी को सिंचित उत्तर-पश्चिम में पैक किया। कुछ छोटे मालिक उपज और भोजन पाए; भूमिहीन चरम मजदूरी पाए। पूँजी लागत, साहूकार ऋण और असुरक्षित काश्तकारी लाभ मालिकों को सौंपते रहे। वर्षाश्रित क्षेत्र और मशीनीकरण कई सीमांत घरों को पीछे छोड़ गए। जल स्तर गिरावट और कीटनाशक पारिस्थितिक लागत हैं जिनसे छोटा किसान आसानी से नहीं निकलता।
Model answer
Introduction
1960–70 की हरित क्रांति ने उच्च उत्पादक गेहूँ-धान, रासायनिक उर्वरक, नलकूप और खरीद को कुछ सिंचित क्षेत्रों—विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश—में पैक किया। लघु और सीमांत किसान—कम भूमि वाले—उस पैकेज से उपज अवसर और लागत जाल दोनों के रूप में मिले।
Body
लाभ जो कुछ छोटे जोतदार पकड़ सके
- जहाँ सिंचाई, एचवाईवी बीज और पास मंडी थी, दो एकड़ घर भी पारंपरिक किस्मों से अधिक अनाज उठाकर अधिक सुरक्षित खा सका।
- गेहूँ-धान पट्टी में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सार्वजनिक खरीद अधिशेष को नकद बनाती थी, जिसे कुछ छोटे मालिक भूमि पट्टे या पंप खरीद पर लगाते थे।
- हरित क्रांति खेतों पर किराए काम ने भूमिहीन के लिए चरम मौसम मजदूरी बढ़ाई, इसलिए भूमिहीन उछाल से पूरी तरह बाहर नहीं थे।
कई लघु-सीमांत सापेक्ष क्यों पिछड़े
- पैकेज पूँजी-प्रयोगी था: बीज, उर्वरक, कीटनाशक और पंप के लिए डीजल या बिजली; सस्ते ऋण के बिना साहूकार दर चुकाई और एक असफल मौसम के बाद कर्ज आया।
- काश्तकार और बटाईदार अक्सर इनपुट वित्त करते रहे जबकि दर्ज मालिक एमएसपी चेक ले गया, इसलिए जोत असुरक्षा ने उपज लाभ छीन लिया।
- क्षेत्रीय पक्षपात ने पूर्व, पठार और बुंदेलखंड के वर्षाश्रित छोटे जोतदारों को पारंपरिक उपज पर छोड़ा जबकि उत्तर-पश्चिम आगे निकला—वर्गों और क्षेत्रों के बीच असमानता।
- मशीनीकरण (ट्रैक्टर, कंबाइन) ने उपज बढ़ते हुए भी किराए श्रम के दिन काटे, इसलिए मजदूरी पर जीने वाले सीमांत घरों पर दूसरा दबाव पड़ा।
- एकल फसल, गिरता जल स्तर और कीटनाशक संपर्क उन छोटे किसानों को मारते हैं जो खेत आसानी से नहीं बदल सकते या टैंकर पानी नहीं खरीद सकते।
नीति पाठ
- बाद के सुधार—लघु-कृषि ऋण, किसान क्रेडिट कार्ड, मृदा स्वास्थ्य कार्ड और पूर्वी भारत धक्के—मानते हैं कि बिना जल, काश्तकारी और सस्ते ऋण का एचवाईवी पैमाना-तटस्थ नहीं।
Flow diagram
flowchart TD GR[हरित क्रांति एचवाईवी जल उर्वरक एमएसपी] --> G[उपज और खाद्य सुरक्षा] GR --> C[पूँजी लागत ऋण काश्तकारी] GR --> R[सिंचित उत्तर-पश्चिम पक्षपात] C --> M[लघु सीमांत दबाव] R --> M G --> N[राष्ट्रीय अनाज अधिशेष] M --> D[कर्ज पारिस्थितिकी मजदूरी हानि]
Conclusion
हरित क्रांति ने खाद्य उत्पादन बढ़ाया और कुछ सिंचित छोटे मालिकों की मदद की, पर पैमाना-तटस्थ नहीं थी। ऋण, काश्तकारी, क्षेत्रीय जल और पारिस्थितिकी ने तय किया कि सीमांत किसान अधिशेष पाए या कर्ज। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और दो-एकड़ कुएँ पर संकट साथ रह सकते हैं।
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क्या हरित क्रांति सभी छोटे किसानों को छोड़ गई?
नहीं। गेहूँ-धान पट्टी के सिंचित छोटे मालिक अक्सर लाभ पाए। काश्तकार और वर्षाश्रित सीमांत अक्सर नहीं।
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क्या प्रौद्योगिकी स्वयं छोटी जोत के विरुद्ध पक्षपाती थी?
बीज विभाज्य है; पंप, समय पर ऋण और काश्तकारी नहीं। पक्षपात पूरक इनपुट में था, केवल जीन में नहीं।
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