Revision summary
अनुच्छेद 21 विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना जीवन और दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करने से रोकता है। मेनका गांधी (1978) ने प्रक्रिया को निष्पक्ष, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होना आवश्यक ठहराया। जीवन में आजीविका, स्वास्थ्य, आश्रय, पर्यावरण और गरिमा हैं। स्वतंत्रता में निजता, शीघ्र विचारण, विधिक सहायता और यातना से बचाव हैं। खंड चौड़ा है पर अभी जीवन, स्वतंत्रता और वैध लोक-विधि कर्तव्य से बँधा है।
Model answer
Introduction
अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही जीवन या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित किया जाएगा। आज की परिधि न्यायिक सूची है, ए.के. गोपालन का संक्षिप्त औपनिवेशिक पाठ नहीं।
Body
मूल पाठ और मोड़
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के बाद अनुच्छेद 21 की प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए, इसलिए 14, 19 और 21 साथ पढ़े जाते हैं।
- जीवन पशु अस्तित्व से अधिक है (फ्रांसिस कोराली मुलिन); दैहिक स्वतंत्रता मनमाने राज्य कार्य के विरुद्ध शारीरिक और निर्णयात्मक स्वतंत्रताओं का चौड़ा समूह है।
अनुच्छेद 21 में पढ़े गए अधिकार
- आजीविका (ओल्गा टेलिस), आश्रय, स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण और गरिमा को जीवन का भाग माना गया है जब राज्य का कृत्य या लोप उन्हें नष्ट करे।
- शीघ्र विचारण, विधिक सहायता, यातना और हथकड़ी से बचाव, तथा निजता (के.एस. पुट्टस्वामी, 2017) दैहिक स्वतंत्रता के भीतर बैठते हैं।
- शिक्षा अनुच्छेद 21ए से पहले 21 से पढ़ी गई; समुचित पर्यावरण और एकांत कारावास के विरुद्ध अधिकार भी इसी खंड पर चलते हैं।
सीमाएँ
- अनुच्छेद 21 हर सामाजिक दावे का कोरा चेक नहीं; न्यायालयों को जीवन या स्वतंत्रता से कड़ी और आमतौर पर राज्य कर्तव्य चाहिए, निजी इच्छा-सूची नहीं।
Flow diagram
flowchart TD A21[अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता] --> M[मेनका निष्पक्ष प्रक्रिया] M --> L[आजीविका स्वास्थ्य पर्यावरण गरिमा] M --> P[निजता शीघ्र विचारण विधिक सहायता]
Conclusion
अनुच्छेद 21 की परिधि में अब गरिमा, आजीविका, स्वास्थ्य, पर्यावरण, शीघ्र न्याय, विधिक सहायता और निजता हैं, क्योंकि जीवन और स्वतंत्रता को निष्पक्ष संवैधानिक गारंटी के रूप में पढ़ा गया। खंड अभी विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया माँगता है; वह शेष संविधान निरस्त नहीं करता।
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क्या अनुच्छेद 21 के पाठ में निजता लिखी है?
नहीं। निजता उच्चतम न्यायालय ने पढ़ी, विशेषकर पुट्टस्वामी (2017) में।
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क्या हर निर्देशक तत्त्व अब अनुच्छेद 21 का मौलिक अधिकार है?
नहीं। न्यायालय जीवन और स्वतंत्रता सावधानी से बढ़ाते हैं। कई सामाजिक-आर्थिक दावे अभी निर्देश के रूप में चलते हैं, रिट-तैयार अधिकार के रूप में नहीं।
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