Revision summary
ओटावा घोषणा 1996 ने आठ ध्रुव-परिक्रमा राज्यों की आर्कटिक परिषद बनाई। मूल निवासी स्थायी प्रतिभागियों की संरचनात्मक आवाज वैश्विक मंचों में दुर्लभ है। छह कार्य समूह पर्यावरण और विकास विज्ञान उत्पन्न करते हैं। अध्यक्षता घूमती है; निर्णय सहमति हैं, बहुमत नहीं। सैन्य सुरक्षा अधिदेश से बाहर है। भारत (2013) जैसे पर्यवेक्षक योगदान कर सकते हैं, मत नहीं।
Model answer
Introduction
आर्कटिक परिषद आर्कटिक के पर्यावरण और सतत विकास का प्रमुख अंतर-सरकारी मंच है। वह सैन्य गठबंधन नहीं और संयुक्त राष्ट्र अंग नहीं। संक्षिप्त टिप्पणी को दिखाना चाहिए कि मेज पर कौन बैठता है, सहमति कैसे चलती है, और भारत जैसे पर्यवेक्षक मत से बाहर क्यों रहते हैं।
Body
संरचना
- परिषद 19 सितंबर 1996 की ओटावा घोषणा से आठ आर्कटिक राज्यों के बीच बनी: कनाडा, डेनमार्क साम्राज्य (ग्रीनलैंड के लिए), फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूसी संघ, स्वीडन और संयुक्त राज्य।
- वे आठ सदस्य हैं; अध्यक्षता उनमें प्रत्येक दो वर्ष घूमती है।
- आर्कटिक मूल निवासी जनता के छह संगठन स्थायी प्रतिभागी हैं—उदाहरण इन्यूट सर्कम्पोलर काउंसिल और सामी काउंसिल—पूर्ण परामर्श अधिकारों के साथ, जो परिषद की विशिष्ट विशेषता है।
- छह कार्य समूह वैज्ञानिक भार ढोते हैं: एएमएपी (प्रदूषण), सीएएफएफ (जैव विविधता), ईपीपीआर (आपात), पीएएमई (समुद्री पर्यावरण), एसडीडब्ल्यूजी (सतत विकास) और एसीएपी (संदूषक कार्रवाई)।
- ट्रॉम्सो में छोटा स्थायी सचिवालय अध्यक्ष का समर्थन करता है; वरिष्ठ आर्कटिक अधिकारी मंत्रिस्तरीय बैठकों के बीच संचालन करते हैं।
- पर्यवेक्षकों में अनेक गैर-आर्कटिक राज्य (भारत 2013 में शामिल), कभी व्यावहारिक दर्शक सीट पर ईयू, और कुछ एनजीओ हैं; पर्यवेक्षक परियोजना सुझा और वित्त कर सकते हैं पर मत नहीं देते।
क्रियाशीलता
- निर्णय आठ सदस्यों की सहमति से, स्थायी प्रतिभागियों से परामर्श बाद; भारित मत नहीं और आर्कटिक संसद नहीं।
- प्रत्येक दो वर्ष मंत्रिस्तरीय बैठकें घोषणाएँ जारी करती हैं; कार्य समूह जलवायु, ब्लैक कार्बन, नौवहन और जैव विविधता आकलन देते हैं जो उन पाठों को खिलाते हैं।
- परिषद सैन्य सुरक्षा स्पष्ट रूप से बाहर रखती है; खोज-बचाव और तेल रिसाव उपकरण साथ में बने, नाटो प्रतिरूप के रूप में नहीं।
- क्रियाशीलता विज्ञान कूटनीति और उच्च उत्तर में रूस-पश्चिम सहयोग पर निर्भर है; 2022 के बाद अनेक कार्य पटरियों पर वह सहयोग थमा, जिसने मंच की राजनीतिक नाजुकता दिखाई।
- भारत के लिए पर्यवेक्षक भूमिका जलवायु विज्ञान, नौवहन मार्गों और शोध स्टेशनों की वैधता तक पहुँच है, सदस्यों के मंच पर सीट नहीं।
सीमा की टिप्पणी
- परिषद यूएनसीएलओएस या महाद्वीपीय मग्नतट दावों पर गैर-सदस्यों को बाध्य नहीं कर सकती; वह मंच प्लस कार्य समूह है, आर्कटिक सरकार नहीं।
Flow diagram
flowchart TD M[8 आर्कटिक राज्य] --> D[सहमति निर्णय] PP[स्थायी प्रतिभागी] --> D WG[छह कार्य समूह] --> D O[भारत सहित पर्यवेक्षक] --> WG
Conclusion
आर्कटिक परिषद की संरचना आठ राज्य, मूल निवासी स्थायी प्रतिभागी, छह कार्य समूह और घूमती अध्यक्षता है। वह पर्यावरण और विकास पर सहमति से चलती है, पर्यवेक्षक हाशिए पर। वह डिजाइन उसे अद्वितीय और तब दुर्बल भी बनाता है जब महाशक्ति राजनीति कार्य समूह जमा दे।
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क्या आर्कटिक परिषद नाटो जैसी संधि संगठन है?
नहीं। वह घोषणा से सहमति मंच है। पारस्परिक रक्षा खंड नहीं चलाती।
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क्या भारत सदस्य बन सकता है?
सदस्यता आठ आर्कटिक राज्यों तक सीमित है। गैर-आर्कटिक देश केवल पर्यवेक्षक हो सकते हैं।
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