Q1 · UPPSC PCS मुख्य परीक्षा 2020 · GS II · 8 अंक · कक्ष में ~125 शब्द · 1 min read

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न्यायिक सक्रियतावाद की व्याख्या कीजिए तथा भारत में कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के पारस्परिक संबंधों पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।

विषय: Executive and Judiciary. पाठ्यक्रम: Structure, organisation and functioning of the Executive and the Judiciary. वही आधिकारिक प्रश्न वर्ष 2020 और Executive and Judiciary से।

Revision summary

न्यायिक सक्रियतावाद जनहित याचिका तथा अनुच्छेद 32, 226 और 142 से रिक्ति भरकर अधिकार लागू करना है। मेनका गांधी और विशाखा जैसे मामले दिखाते हैं कि कार्यपालिका पिछड़ने पर न्यायालय आगे बढ़ा। प्रभाव द्वैध है: अधिक जवाबदेही और नियुक्ति-नीति पर अधिक रगड़। एनजेएसी (2015) और योजना-निगरानी शक्ति-पृथक्करण पर तनाव दिखाते हैं। संबंध तब चलता है जब डिक्री अपवाद हो और कार्यपालिका तब विधायन करे।

Model answer

Introduction

न्यायिक सक्रियतावाद संवैधानिक शक्ति का वह उपयोग है जिसमें न्यायालय पाठ के संकीर्ण पाठ से आगे बढ़कर रिक्ति भरते, अधिकार लागू करते और कार्यपालिका की जड़ता सुधारते हैं। मूल्यांकन में अधिकार-रक्षा और कार्यपालिका-न्यायपालिका रेखा पर तनाव दोनों आने चाहिए।

Body

अवधारणा

  • सक्रियता अनुच्छेद 32 और 226, जनहित याचिका में विस्तृत लोकस और अनुच्छेद 142 की पूर्ण न्याय शक्ति से बढ़ी।
  • मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने अनुच्छेद 21 चौड़ा किया; विशाखा (1997) ने उस स्थान पर दिशानिर्देश दिए जहाँ कार्यपालिका ने विधायन नहीं किया था।
  • मूल संरचना सिद्धांत (केशवानंद भारती, 1973) न्यायालय को उस संशोधन को भी काटने देता है जो न्यायिक समीक्षा खोखली करे।

कार्यपालिका-न्यायपालिका संबंध पर प्रभाव

  • सकारात्मक: बंधुआ श्रम, पर्यावरण और विलंबित नियुक्तियों पर न्यायालयों ने कार्यपालिका को धकेला, अधिकारों को प्रवर्तनीय कर्तव्य बनाया।
  • तनाव: नीति पर बार-बार रोक, योजनाओं की निगरानी और एनजेएसी निर्णय (2015) ने यह धारणा जगाई कि न्यायालय केवल विधि नहीं, शासन भी लिखता है।
  • थैली और कर्मी अभी कार्यपालिका के हैं; विधायी अनुवर्तन के बिना सक्रियता ऐसे दिशानिर्देश छोड़ती है जिन्हें बाद का क़ानून सोखना या बदलना पड़ता है।

संतुलित मूल्यांकन

  • सक्रियता शून्य और अधिकार-विफलता का उत्तर है, समानांतर मंत्रिमंडल नहीं।
  • संबंध तभी स्वस्थ रहता है जब न्यायालय अनुच्छेद 32, 141 और 142 अंतिम उपाय माने और कार्यपालिका डिक्री की अवज्ञा के बजाय उसे लागू करे।

Flow diagram

flowchart TD
  V[अधिकार शून्य या जड़ता] --> C[अनुच्छेद 32 226 142]
  C --> A[सक्रिय डिक्री या दिशानिर्देश]
  A --> E[कार्यपालिका क्रियान्वयन]
  A --> T[नीति स्थान पर तनाव]

Conclusion

न्यायिक सक्रियतावाद अधिकार-केन्द्रित, रिक्ति-भरक समीक्षा है। इसने कार्यपालिका को अधिक जवाबदेह और अधिक रक्षात्मक भी बनाया। संवैधानिक संतुलन तब टिकता है जब सक्रियता अपवाद रहे और राजनीतिक अंग तब विधायन करें।

Quick related

Students also ask

  • "The President of India cannot become a dictator." Explain.

    Next question in the 2020 paper (Q2). View answer →

  • क्या न्यायिक सक्रियतावाद न्यायिक समीक्षा के समान है?

    समीक्षा वैधता जाँचती है। सक्रियता समीक्षा की वह शैली है जो विधायी या कार्यपालिका रिक्ति भरती है और अक्सर निरंतर परमादेश देती है।

  • क्या संविधान ने ‘न्यायिक सक्रियतावाद’ नामित किया?

    नहीं। यह सैद्धांतिक पद है। प्रयुक्त शक्तियाँ अनुच्छेद 32, 141, 142 और 226 की हैं।

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