Revision summary
भारतीय विशिष्टता लोगों और रीतियों का लंबा मिश्रण है, पिघलता बर्तन नहीं। जाति-नातेदारी, संयुक्त परिवार के रूप और मزار समन्वय उस पैटर्न को चिह्नित करते हैं। अनुसूचित भाषाएँ, कई धर्म और क्षेत्रीय कलाएँ जमीन पर विविधता हैं। संविधान, भाषायी राज्य और साझा सार्वजनिक कर्मकांड समरूपता के बिना एकता चलाते हैं। सांप्रदायिक और जाति हिंसा उसी विविधता को तनती है जिसकी कथन सराहना करता है।
Model answer
Introduction
भारतीय समाज को विशिष्ट कहा जाता है क्योंकि भाषाओं, धर्मों और रीतियों की सभ्यतागत निरंतरता एक साथ जीती है बिना एक पिघलते बर्तन की संस्कृति बने। सांस्कृतिक विविधता उस विशिष्टता पर आभूषण नहीं; वह परिवार, त्योहार, विधि और भोजन के केरल से कुमाऊँ तक वास्तव में चलने का ढंग है।
Body
सभ्यतागत पैटर्न के रूप में विशिष्टता
- सिंधु, वैदिक, बौद्ध, जैन, भक्ति, सल्तनत, मुगल और औपनिवेशिक परतों के लंबे अध्यारोपण ने लोगों के साफ प्रतिस्थापन की जगह मिश्रित आदतें पैदा कीं।
- कई क्षेत्रों में संयुक्त परिवार, पुराने गाँव में जजमानी-प्रकार सेवा संबंध, और जाति व्यवसाय तथा विवाह वृत्त दोनों के रूप में, सामाजिक रूप हैं जिनकी सटीक यूरोपीय प्रति नहीं, यद्यपि वे बदलते हैं।
- धर्म, संप्रदाय और सांप्रदायिक बहस मजारों, पीरों और स्थानीय देवों के व्यावहारिक समन्वय के साथ बैठे, जो नारे नहीं, जीती व्यवस्था के रूप में विशिष्टता है।
- संविधान (1950) ने फिर वह बहुलता कानून में लिखी: समता, धर्म की स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, तथा भाषाओं की आठवीं अनुसूची।
जमीन पर सांस्कृतिक विविधता
- बाईस अनुसूचित भाषाएँ और कई और मातृभाषाएँ, भिन्न लिपियों और साहित्यों के साथ, संचार को ही संघीय तथ्य बनाती हैं।
- हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और जनजातीय आस्थाएँ सड़कें और पंचांग साझा करती हैं; दीपावली, ईद, क्रिसमस, गुरु नानक जयंती और जनजातीय फसल रीतियाँ एक सार्वजनिक स्थान में भिन्न पवित्र वर्ष चिह्नित करती हैं।
- भोजन, वेश, नातेदारी (उत्तर भारतीय ग्राम बहिर्विवाह बनाम कई दक्षिण भारतीय मामा-बहनोई पैटर्न), और मंच कलाएँ (कर्नाटक और हिंदुस्तानी, यक्षगान, नौटंकी, मणिपुरी) क्षेत्रीय व्याकरण हैं, एक राष्ट्रीय पोशाक नहीं।
- उत्तर प्रदेश स्वयं अवधी, ब्रज, बुंदेली और भोजपुरी संस्कृतियाँ, अवध की गंगा-जमुनी शिष्टता, और घना मेला पंचांग जमा करता है, जो एक राज्य के भीतर विविधता है।
समरूपता के बिना एकता
- तीर्थ परिपथ (चार धाम, काशी, अजमेर), रेल, संपर्क भाषा के रूप में हिंदी-अंग्रेजी, क्रिकेट, सिनेमा और साझा गणतंत्र दिवस कर्मकांड स्थानीय को मिटाए बिना साझा सार्वजनिक बनाते हैं।
- अनुच्छेद 29-30 और व्यक्तिगत विधियाँ दिखाती हैं कि संघ भेद की रक्षा करता है; भाषायी राज्य (1956 से) और बाद का तेलंगाना (2014) दिखाते हैं कि विविधता राजनीतिक मान्यता भी माँगती है।
- विशिष्टता सांप्रदायिक दंगों, समरूप करती मीडिया और जाति अत्याचार से तनती है; चर्चा तभी ईमानदार है जब इन्हें उसी विविधता पर हमले के रूप में नामित किया जाए जिसकी प्रश्न प्रशंसा करता है।
- न्यायपूर्ण चर्चा यह है कि भारतीय समाज इसलिए विशिष्ट है कि वह बहुलता—परिवार, आस्था, भाषा और क्षेत्र—को संस्थागत करता है, इसलिए नहीं कि उसमें संघर्ष नहीं।
Flow diagram
flowchart TD C[सभ्यतागत परतें] --> U[मिश्रित विशिष्टता] L[भाषाएँ आस्थाएँ क्षेत्र] --> D[सांस्कृतिक विविधता] D --> F[परिवार त्योहार भोजन कला] U --> K[संवैधानिक एकता] D --> K
Conclusion
भारतीय समाज विशिष्टता और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है क्योंकि कई भाषाएँ, आस्थाएँ और क्षेत्रीय रीतियाँ एक सभ्यतागत तथा संवैधानिक ढाँचे को साझा करती हैं। वह विशिष्टता तब टिकती है जब एकता भेद के सम्मान के रूप में चले, एक संस्कृति बनने के दबाव के रूप में नहीं।
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क्या विशिष्टता का अर्थ संघर्ष का अभाव है?
नहीं। विशिष्टता भाषाओं, आस्थाओं और क्षेत्रों की टिकाऊ बहुलता है। दंगे और जाति हिंसा दिखाते हैं कि उस बहुलता पर हमला हो सकता है।
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क्या विविधता में एकता क्षेत्रीय संस्कृति मिटाती है?
चलती भारतीय एकता साझा नागरिकता और सार्वजनिक कर्मकांड प्रयोग करती है जबकि भाषायी राज्य और व्यक्तिगत सांस्कृतिक अधिकार स्थानीय को जीवित रखते हैं।
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