Revision summary
ब्रह्म, आर्य, फुले, अलीगढ़ और सहयोगी मिशनों ने धर्म को सार्वजनिक सुधार परियोजना बनाया। विधवा पुनर्विवाह, सती बहस और महिला शिक्षा ने घर को राष्ट्र से जोड़ा। विश्वविद्यालयों और समाचारपत्रों ने पेशेवर राजनीतिक वर्ग बनाया। धन-निष्कासन आलोचना और प्रारंभिक राष्ट्रवाद इसी मिट्टी पर उगे। आंदोलन शहरी और विषम था; जाति और लिंग सीमाएँ रहीं।
Model answer
Introduction
उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय पुनर्जागरण औपनिवेशिक शासन में सामाजिक-धार्मिक सुधार, नई शिक्षा और मुद्रित बहस का समूह था। उसने भारत के बाद के विकास में सहायता की क्योंकि सार्वजनिक रूप से कौन बोल सकता है यह बदला, कारखाने रातोंरात बनाकर नहीं।
Body
सामाजिक और धार्मिक सुधार
- राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज ने सती तथा केवल मूर्ति-केंद्रित कर्मकांड पर प्रहार किया, और एक ईश्वरवादी शास्त्रीय सार्वजनिक नीति का तर्क दिया जिससे सामाजिक कानून सोचनीय बना।
- ईश्वर चंद्र विद्यासागर का विधवा-पुनर्विवाह अभियान और 1856 अधिनियम, केशवचंद्र सेन के बाद के ब्रह्म विभाजन, तथा ज्योतिराव फुले का सत्यशोधक जाति-विरोधी कार्य उसी जागरण के भिन्न द्वार खोलते हैं।
- स्वामी दयानंद का आर्य समाज, रामकृष्ण-विवेकानंद का वेदांत मिशन, सर सैयद का अलीगढ़ परियोजना, और सिखों में सिंह सभा दिखाते हैं कि हिंदू, मुस्लिम और सिख अभिजात सभी ने समुदाय को पुनर्परिभाषित करने के लिए मुद्रण और संगठन प्रयोग किए।
- इन प्रयासों ने जाति या पितृसत्ता समाप्त नहीं की, किंतु अधिकार, शिक्षा और ‘उत्थान’ की भाषा बनाई जिसे बाद का राष्ट्रवाद और संविधान विरासत में लेते हैं।
शिक्षा, प्रेस और राजनीतिक विकास
- अंग्रेजी और देशी विद्यालय, मिशनरी महाविद्यालय, तथा कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय ने पेशेवर वर्ग पैदा किया जो कानून, चिकित्सा और प्रारंभिक कांग्रेस में बैठा।
- समाचारपत्र, पुस्तिकाएँ और सभा ने स्थानीय शिकायत को अखिल भारतीय बातचीत बनाया; यह साहित्यिक फैशन जितना राजनीतिक विकास भी है।
- महिलाओं की शिक्षा, यद्यपि सीमित, और सहमति आयु की बहसें, घरेलू सुधार को आधुनिक राष्ट्र के विचार से जोड़ती हैं।
- धन-निष्कासन की आर्थिक आलोचना और बाद की स्वदेशी इसी सुधार मिट्टी पर उगी: शास्त्र और विद्यालय पर बहस करने वाला जन शुल्क और स्वराज पर भी बहस कर सका।
- उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, बनारस और आर्य नेटवर्क दिखाते हैं कि गंगा मैदान इस पुनर्जागरण की प्रयोगशाला था, केवल बंगाल नहीं।
सीमाएँ
- पुनर्जागरण शहरी, साक्षर और अक्सर उच्च जाति का था; किसान और अधिकांश महिलाएँ इसके संगठनों के बाहर रहीं।
- उसी मुद्रित सार्वजनिक में सांप्रदायिक संगठन भी कठोर हुए, इसलिए सामुदायिक पहचान का विकास केवल उदार नहीं था।
Flow diagram
flowchart TD R[सुधार संगठन] --> E[विद्यालय प्रेस] E --> P[राजनीतिक सार्वजनिक कांग्रेस] R --> S[सामाजिक कानून महिला जाति] S --> D[बाद का राष्ट्रीय विकास] P[P] --> D[D]
Conclusion
उन्नीसवीं शताब्दी के पुनर्जागरण ने सामाजिक कानून सुधार, विद्यालय और प्रेस फैलाकर, तथा राजनीतिक सार्वजनिक प्रशिक्षित कर भारत के विकास में सहयोग दिया। उसकी देन अधिकार और राष्ट्र की भाषा है; सीमा वर्ग, जाति और अधूरी लिंग क्रांति है।
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क्या भारतीय पुनर्जागरण यूरोप की नकल था?
उसने मुद्रण, संगठन और कुछ प्रबोध भाषा प्रयोग की, किंतु उसके ग्रंथ और लड़ाइयाँ भारतीय थीं: सती, जाति, शास्त्र और औपनिवेशिक कानून।
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क्या उसने अकेले स्वतंत्रता कराई?
नहीं। उसने एक सार्वजनिक और सुधार शब्दावली प्रशिक्षित की। जन राष्ट्रवाद, युद्ध और 1947 की राजनीति बाद की परतें हैं।
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