Revision summary
1813 के बाद व्यापार नियम और लंकाशायर मिलों ने भारतीय हथकरघा निर्यात हटाया। राष्ट्रवादियों ने इसे विऔद्योगीकरण और धन-निष्कासन कहा। कृषि नील, अफीम, कपास और जूट में धकेली गई, अकाल जोखिम के साथ। रेल और कुछ बंबई-अहमदाबाद मिलें पतली आधुनिक परत थीं। खाता भारत के लिए संतुलित औद्योगिक क्रांति के बिना अवसंरचना है।
Model answer
Introduction
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के बाद ब्रिटेन की कारखाना क्रांति को भारतीय कच्चा कपास, नील, अफीम और बंदी कपड़ा बाजार चाहिए था। आलोचनात्मक परीक्षण में हस्तशिल्प की तबाही, चाँदी की निकासी, तथा बाद की रेल और मिलें जो संतुलित अर्थव्यवस्था नहीं लौटातीं, एक साथ आने चाहिए।
Body
विऔद्योगीकरण और व्यापार नियम
- 1813 के चार्टर अधिनियम के बाद जब भारत ब्रिटिश निजी व्यापार के लिए अधिक खुला, मशीन-निर्मित लंकाशायर कपड़े ने बंगाल मलमल, ढाका बुनावट और भीतरी हथकरघा को पीछे धकेला, जो पहले यूरोप और एशिया से बुलियन कमाते थे।
- शुल्क विषमता — भारत में ब्रिटिश सूत और कपड़े का मुक्त प्रवेश, जबकि ब्रिटेन में भारतीय वस्त्रों पर शुल्क — राष्ट्रवादी लेखकों द्वारा विऔद्योगीकरण कही गई नीति का केंद्र है।
- दादाभाई नौरोजी का धन-निष्कासन सिद्धांत, आर. सी. दत्त के आर्थिक इतिहास, और कारीगर बेरोजगारी के बाद के अनुमान तैयार निर्यात से कच्चे माल — कपास, जूट, खाल, चीन के लिए अफीम — की ओर खिसकाव दिखाते हैं।
- 1853 के बाद रेल, भाप जहाज और तार ने उस एकतरफा वस्तु प्रवाह को सस्ता किया; रूप में आधुनिक अवसंरचना, कार्य में औपनिवेशिक दोहन।
कृषि जीवन, अकाल और मिश्रित खाता
- वाणिज्यीकरण ने किसानों को नील (नील विद्रोह, 1859–60), अफीम, कपास और जूट में धकेला, चाँदी में भू-राजस्व की नकद जरूरत बढ़ाई जबकि खाद्य भंडार पतले हुए; दक्कन और बंगाल के अकाल इसी वाणिज्यिक मानचित्र पर बैठते हैं।
- चाय और नील के बागान, तथा बाद में बंबई और अहमदाबाद की सूती मिलें (1850–70 के दशक), पतला आधुनिक क्षेत्र और नई श्रमिक श्रेणी बनाते हैं, इसलिए औद्योगिक क्रांति केवल विनाश नहीं; ब्रिटिश पूँजी और प्रबंध एजेंसियों के अधीन विलंबित, विषम औद्योगीकरण है।
- आलोचना इसलिए एक वाक्य से इनकार करती है: हस्तशिल्प और ग्राम बुनकर हारे; बंदरगाह, रेल और कुछ मिल नगर जीते; प्रति व्यक्ति उद्योग और कुशल रोजगार ब्रिटेन की अपनी कारखाना छलांग से नहीं चला।
- 1947 के बाद वही रेल-बंदरगाह ढाँचा दोबारा प्रयुक्त हुआ, जो भारत को लंकाशायर के कच्चे खेत बनाने की उन्नीसवीं शताब्दी की सामाजिक कीमत को रद्द नहीं करता।
Flow diagram
flowchart TD IR[ब्रिटिश कारखाना उछाल] --> D[लंकाशायर कपड़ा शुल्क पक्षपात] IR --> R[कच्चा कपास नील अफीम] D --> E[कारीगर तबाही निष्कासन] R --> E IR --> M[रेल पतला मिल क्षेत्र] M --> E
Conclusion
ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति ने भारत को कच्चे उत्पाद के आपूर्तिकर्ता और कपड़े के बाजार के रूप में ढाला, कारीगर आजीविका खींचते हुए रेल और कुछ मिलें बिछाईं। आलोचनात्मक संतुलन भारतीय श्रम के लिए आधुनिक, स्व-केंद्रित औद्योगिक क्रांति के बिना आधुनिक अवसंरचना है।
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क्या औद्योगिक क्रांति ने भारत को केवल हानि पहुँचाई?
उसने कारीगरों को हानि पहुँचाई और कृषि तिरछी की। रेल, बंदरगाह और मिलें वास्तविक थीं किंतु पूरे भारतीय कारखाना तंत्र से अधिक औपनिवेशिक व्यापार की सेवा करती थीं।
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क्या विऔद्योगीकरण पूर्ण था?
नहीं। हथकरघा विशिष्ट क्षेत्रों में बचा और मिलें बाद में बढ़ीं। आरोप सापेक्ष गिरावट और खोई निर्यात अगुआई है, हर करघे की मृत्यु नहीं।
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