Q3 · UPPSC PCS मुख्य परीक्षा 2025 · GS I · 8 अंक · कक्ष में ~125 शब्द · 2 min read

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“उग्रवाद, उदारवादियों के विचारों और कार्यप्रणाली की प्रतिक्रिया था।” इस कथन की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

विषय: Modern Indian history. पाठ्यक्रम: Modern Indian history from A.D. 1757 to A.D. 1947 — significant events, personalities and issues. वही आधिकारिक प्रश्न वर्ष 2025 और Modern Indian history से।

Revision summary

उदारवादी याचिका, परिषद और ब्रिटिश जनमत पर विश्वास करते थे। 1905 के विभाजन ने तिलक, पाल और लाजपत राय को स्वराज, बहिष्कार और स्वदेशी की ओर धकेला। 1907 का सूरत कांग्रेस के भीतर विधि-संघर्ष दिखाता है। उग्रवाद का रचनात्मक स्वदेशी कार्यक्रम भी था, इसलिए वह केवल प्रतिक्रिया नहीं था। बाद का राष्ट्रवाद संवैधानिक कार्य और जन दबाव जोड़ता है।

Model answer

Introduction

कथन कहता है कि उग्रवाद उदारवादी विचारों और कार्यप्रणाली की प्रतिक्रिया था। आलोचनात्मक व्याख्या में वह प्रतिक्रिया दिखनी चाहिए, और यह भी दिखना चाहिए कि उग्रवादियों के अपने लक्ष्य थे।

Body

उदारवादी: विचार और विधि

  • दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे उदारवादी मानते थे कि ब्रिटिश शासन को कानून के भीतर तर्क से सुधारा जा सकता है।
  • वे याचिका, परिषद भाषण और धन-निष्कासन तर्क से प्रशासन में भारतीय हिस्सेदारी माँगते थे।
  • उनकी कार्यप्रणाली वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन, प्रार्थना, और यह विश्वास था कि ब्रिटिश जनमत सरकारी नीति सुधारेगा।
  • वे क्रमिक संवैधानिक प्रगति स्वीकार करते थे और ब्रिटिश वस्तुओं या पदों के जन-बहिष्कार की माँग नहीं करते थे।

प्रतिक्रिया के रूप में उग्रवाद

  • 1905 का बंगाल विभाजन, उदारवादी याचिकाओं की विफलता, और सेवाओं में जातीय बाधा ने कई युवा नेताओं को वह विधि छोड़ने पर बाध्य किया।
  • बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय ने याचिका के स्थान पर स्वराज, बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा माँगी।
  • उग्रवादियों ने प्रार्थना और निष्ठा को वह विधि माना जो विभाजन नहीं रोक सकी, यही कथन वाली प्रतिक्रिया है।
  • 1907 का सूरत विभाजन कांग्रेस के भीतर विधियों के संघर्ष को सार्वजनिक बनाता है।

आलोचनात्मक सीमा

  • उग्रवाद केवल उदारवादियों के विरुद्ध मनोदशा नहीं था; स्वदेशी उद्यम, उत्सव और राजनीतिक शिक्षा उसका सकारात्मक कार्यक्रम था।
  • कुछ उग्रवादी विधियाँ सार्वजनिक आंदोलन में रहीं, जबकि छोटा क्रांतिकारी धारा शस्त्र प्रयोग करती थी, इसलिए ‘उग्रवाद’ एक ही अभ्यास नहीं है।
  • उदारवादियों ने आर्थिक निष्कासन पहले नामित किया था; उग्रवादियों ने निदान से अधिक विधि बदली।
  • 1916 के लखनऊ समझौते और बाद में गांधी की जन सत्याग्रह दिखाते हैं कि बाद का राष्ट्रवाद संवैधानिक कार्य और अतिरिक्त-संवैधानिक दबाव दोनों प्रयोग करता है।

Flow diagram

flowchart TD
  M[उदारवादी याचिका] --> F[1905 विभाजन]
  F --> E[बहिष्कार स्वराज स्वदेशी]
  E --> S[सूरत 1907]
  E --> P[स्वयं का कार्यक्रम]

Conclusion

1905 के बाद उग्रवाद ने याचिका और क्रमिकता में उदारवादी विश्वास के विरुद्ध प्रतिक्रिया अवश्य की। यदि सूरत के बाद की मिश्रित विधियाँ और स्वदेशी कार्यक्रम छिप जाएँ तो कथन अधूरा है।

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  • क्या उग्रवादी केवल हिंसक थे?

    नहीं। सार्वजनिक उग्रवाद बहिष्कार, स्वदेशी और स्वराज था। सशस्त्र क्रांतिकारी छोटी और अलग धारा थे।

  • क्या उदारवादियों ने कुछ नहीं किया?

    उन्होंने कांग्रेस बनाई, आर्थिक निष्कासन नामित किया और परिषदों में गए। उनकी विधि 1905 का विभाजन नहीं रोक सकी, इसलिए प्रतिक्रिया आई।

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